काफिया - या
रदीफ़ - था
गाँधी,सुभाष,भगत का साया था
ख्वाब स्वदेश का दिल ने दिखाया था
मार्ग नहीं हुआ ये कभी आसान
विश्वास स्वयं पर सबने जताया था
परतंत्र रह ना कर सकेंगे कभी उन्नति
जीवन का हो दर्शन ऐसा सिखलाया था
आन, बान, शान लिए वीरों की है ये धरती
प्राण जाए वचन ना जाए का धर्म अपनाया था
मातृभूमि के मान से बढ़कर ना कोई सम्मान
जीवन कुर्बान कर "झा" ऋण देश का चुकाया था
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली

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