कभी उदरपूर्ति, धनार्जन हेतु कभी,
तो कभी विलासी जीवन हेतु ही!
अपना घर और गाँव छोड़कर,
इस अनजान शहर में आ गये कहाँ!
आकर खो गए हम कहाँ!
कभी गाँव छोड़ शहर चले,
कभी शहर छोड़ हम नगर चले!
कभी मातृभूमि को छोड़कर ,
हम विदेश में ही रहने चले!
आकर खो गए हम कहाँ !
जन्मभूमि, घर, मात-पिता को,
सखा सहोदर मित्रजनों को!
अपनी माटी की खुशबू को,
छोड़े अपना स्थान और बल को !
आकर खो गए हम कहाँ!
छूटी अपनी जन्मस्थली,
बंधु-बांधव भी पीछे छूटे!
नहीं ठौर अपना यहाँ कोई,
कभी न कोई पूछे यहाँ हमें !
आकर खो गए हम कहाँ!
शहर, नगर या देश हो कोई,
पराया तो पराया ही होता !
गाड़ी, बंगला, दौलत होती,
पर अपनापन कभी न होता !
आकर खो गए हम कहाँ !
आओ फिर हम लौट चलें,
अपनी माटी पुकार रही है!
तन,मन, धन हम वहाँ लगायें,
पोषण करने में वह सक्षम है!
अब न सोचें खो गए हम कहाँ!
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर"
(यह मेरी मौलिक रचना है, सर्वाधिकार सुरक्षित।)
(मुखचित्र गूगल से साभार)

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