कभी धरती से मिलकर दो चार बातें कर लूं
उससे अपने हृदय की कुछ मुलाकाते कर लूं
जब भी याद करता हूं तो कसक सी होती है
मन करता है कि मैं क्षितिज के पार उतर लूं
वो भी ताकती है मेरी ओर तप्त होकर जब
तब बारिश की बूंदों से उसका दामन भर लूं
लहलहा उठती है फसलों की चुनरी ओढ़कर
तब सोचता हूं दिल से उसका मैं दीदार कर लूं
ऐ धरा अब मेरी अधूरी ख्वाहिशों को पूर्ण कर
मैं तेरा प्रियतम हूं तुमसे अपनी बात कह लूं

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