डॉ ० संदीप त्रिवेदी को क्लीनिक में बैठे हुए एक घंटे हो गए थे लेकिन अभी तक वो नहीं आई थी, उसने कल ही तो कहा था
"डॉक्टर साहब, मुझे आपसे मिलना है, देखिए इनकार मत करिएगा, मैं जानती हूं कि आपके पास ज्यादा समय नहीं है आप एक नामी डॉक्टर हैं लेकिन मैं सिर्फ दस मिनट के लिए आपसे मिलना चाहती हूं। अगर नहीं मिली तो शायद मैं मानसिक रूप से डिस्टर्ब हो जाऊं। मेरी समस्या आप ही सुलझा सकते हैं, प्लीज डॉक्टर साहब।" उसकी आवाज में गिड़गिड़ाहट थी फोन से ही उसके हृदय की तेज धड़कने सुनी जा सकती थी, उसकी आवाज का कंपन सुना जा सकता था। वैसे तो डॉक्टर संदीप किसी को भी इतना टाइम नहीं देते थे लेकिन उस लड़की की आवाज में कुछ ऐसी बात थीकि वो ना नहीं कर पाए उन्होंने उस लड़की को कल का टाइम दे दिया।
आज वो उस लड़की का वेट कर रहे थे लेकिन वो नहीं आई , डॉक्टर संदीप को गुस्सा आ रहा था कि आखिर वो आई क्यों नहीं। खुद ही मिलना चाहती है और खुद ही नहीं आई। क्या उसका समय इतना फिजूल है कि कोई भी उसे बरबाद कर दे। उन्हें खुद पर भी झुंझलाहट हो रही थी कि आखिर उन्होंने उसे टाइम दिया ही क्यों? जैसे जैसे समय बीतता जा रहा था वैसे वैसे डॉक्टर संदीप अधीर हो रहे थे। उधर मरीजों का तांता लगा हुआ था उन्हें दम मारने की भी फुरसत नहीं थी। यहां तक कि कभी कभी ऐसा होता था कि उन्हें लंच बॉक्स खोलने तक का टाइम नहीं मिलता था,आखिर दिल्ली के एक नामी हॉस्पिटल में न्यूरो सर्जन के रूप में वो विश्वविख्यात थे। अब वो वहां से रिटायर होकर अपना निजी क्लीनिक चला रहे थे जहां पर उनसे मिलने के लिए तीन दिन पहले से अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है, उस लड़की ने जब उनके कंपाउंडर के पास अपॉइंटमेंट लेने के लिए कॉल की तो उसकी एक ही रट थी कि उसे डॉक्टर साहब से बात करनी है, कंपाउंडर ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की लेकिन वो नहीं मानी तब कंपाउंडर ने डॉक्टर संदीप से बात की , काफी सोच विचार के बाद डॉक्टर संदीप ने खुद उससे बात की और उसे अगले दिन का टाइम दे दिया। लेकिन शाम के 6 बज रहे थे और अभी तक उसका कोई पता नहीं था । डॉक्टर संदीप ने जिनको अपॉइंटमेंट दिया था लगभग सभी मरीजों को देख चुके थे अपने कंपाउंडर को जरूरी हिदायत देकर वो हॉस्पिटल के सामने बने हुए पार्क की ओर बढ़ गए। ये उनका प्रतिदिन का नियम था कि शाम 6 बजे के बाद वो कोई मरीज नहीं देखते थे । शाम 6 से 7 बजे का समय वो पार्क में अपने दोस्तों को देते थे लाफिंग क्लास लेते थे, योगा करते थे ।और पूरे पार्क का एक चक्कर दौड़ते हुए लगाते थे। यही कारण था कि वो पैसठ वर्ष की आयु में भी एकदम फिट और हर बीमारी से दूर थे। पैंसठ की आयु में भी उनका रखरखाव और शारीरिक बनावट ऐसी थी कि वो पचास वर्ष से ऊपर के नहीं लगते थे। उनके दोस्त मजाक में कहते भी थे कि साठा में पाठा की कहावत डॉक्टर संदीप के ऊपर एकदम चरितार्थ होती है। इन्होंने तो जैसे अपनी उम्र के आगे पक्की चहारदीवारी बना दी है, उसे आगे बढ़ने ही नहीं देते। बेचारी कितने सालों से पचास वर्ष के प्लेटफॉर्म पर ही खड़ी है । डॉक्टर संदीप के घनिष्ठ मित्र रविकांत मित्तल चुटकी लेते हुए कहते थे
क्या यार संदीप, उम्र से तेरी दुश्मनी हो गई है क्या ? वो तो पीछे की ओर लौट रही है , आगे बढ़ने का नाम ही नहीं लेती, लगता है तूने उसे पराजित कर दिया है।
तो तुझे क्या प्राब्लम है रवि?तू दोस्ती कर ले और बढ़ाता जा अपनी उम्र को आगे,डॉक्टर संदीप भी कहां पीछे रहने वाले थे। उन्होंने भी रवि के कंधे पर हाथ मारते हुए एक जोरदार कहकहा लगाया।
जब आज डॉक्टर संदीप पार्क पहुंचे तो उनके दोस्त उनका वेट कर रहे थे। इसके बाद शुरू हुआ जिंदादिली का मौसम, कहकहो का सुनहरा दौर , एक के पीछे एक भागते दोस्त, अपनी जिंदगी के अनुभवों को सुनाती हुई कहानियां थमने का नाम ही नहीं ले रही थी, विक्रांत मिश्रा के आज कुछ अलग ही रंग थे उनके बेटे की सगाई हुई थी पिछले हफ्ते,वो हमेशा अपनी होने वाली बहू की तारीफ के पुल बांधते रहते।और शर्माजी जो उनके पड़ोसी थे वो भी खुशी से फूले नहीं समा रहे थे उनकी बेटी स्तुति दो साल बाद अमेरिका से वापस आ रही थी वो वही पर प्रसिद्ध डॉक्टर थी। मित्तल जी की आज शादी की सालगिरह थी वो तो बकायदा केक और कोल्ड ड्रिंक समोसे सब लेकर आए थे, और सारे लोग परहेज भूलकर जमकर दावत उड़ा रहे थे। त्रिपाठी जी अभी अपनी पत्नी के साथ शिमला का टूर करके आए थे तो वो अपनी गाथा गा रहे थे, वहां का इतना सजीव चित्रण किया उन्होंने कि सब लोगों का मन बिना टिकट ही शिमला पहुंच गया, अब मन को तो बिना टिकट यात्रा करने का कोई जुर्माना तो देना नहीं पड़ता , इसलिए वो तो आजाद पंछी की तरह शिमला के दृश्यों को देख रहा था , होटल में खाना खा रहा था वो भी बिना पेमेंट दिए। मानव मन ऐसे ही आनंद की अनुभूति तो करता है, बेलगाम घोड़े की तरह इधर उधर भागता रहता है बिना किसी परिणाम की चिंता किए हुए, एक पल में यहां तो दूसरे ही पल हजारों कोस दूर दूसरे स्थान पर। मस्ती की पाठशाला चल रही थी लेकिन आज उस पाठशाला का मॉनिटर चुपचाप बैठा हुआ था मानो वो वहां होकर भी न हो। रविकांत मित्तल ने डॉक्टर संदीप की ओर देखा और पूछा
क्या हुआ संदीप, तू तो हमारे महफिल की शान है, आज तू इतना उदास क्यों है? ना ठीक से खाया पिया ना ही हंसबोल रहा है? क्या उम्र से तेरी दोस्ती हो रही है? रविकांत मुस्कुराए ।
इस उम्र में तुझे कही प्यार तो नहीं हो गया क्योंकि सारे लक्षण उसी बीमारी के दिख रहे हैं डॉक्टर साहब। ऐसा तो नहीं कि किसी का इलाज करते करते खुद ही उसके बीमार हो गए हो। मिश्रा जी ने भी चुटकी ली। सारे दोस्त ठठ्ठा मारकर हंस पड़े।
नहीं यार, ऐसा कुछ भी नहीं है जैसा तुम सोच रहे हो, मैं आज किसी और वजह से परेशान हूं, इतना कहते हुए उसने उस लड़की से हुई बातचीत के बारे में सारी बाते बता दी।
ओ, तो राज हैं , अरे आज नहीं आई तो कल आ जायेगी इतना परेशान क्यों है? कहीं दिल विल तो नहीं लगा लिया उससे। डॉक्टर संदीप के दोस्त उन्हें परेशान कर रहे थे।
पागल हो तुम लोग? वो मेरी बेटी की उम्र की है, अगर आज मेरी बेटी होती तो इसी उम्र की होती।
चल अब तू परेशान मत हो, रिलैक्स हो जा, हो सकता है उसको कोई काम आ गया हो। अब उठ घर चलते हैं पार्क बंद होने वाला है, अगर देर हुई तो घर में खाना भी नहीं मिलेगा आज। त्रिपाठी जी बोले।
सब दोस्त उठकर घर की ओर बढ़ चले। पार्क के गेट पर डॉक्टर संदीप किसी से टकराए देखा तो एक लड़की नक़ाब पहने हुए खड़ी थी और उसकी दो आंखें उन्हें देख रही थी।
कौन थी वो लड़की?
क्या नाम था उसका?
आइए जानते हैं अगले भाग में, तब तक आप पढ़ते रहिए
नक़ाब से झांकती आंखें
लेखक -
संगीता शर्मा" प्रिया"

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