थक हार कर जब भी बेचेन हो जाती हूँ
हाँ मैं पंछियों को देख ,पुनः ऊर्जा से भर जाती हूँ
कितना सब्र, सभ्य सा जीवन, होता है पंछी का
जितना मिलता उतना लेता दोष ना देता किस्मत का
सारे काम को खुद करता है छोटे छोटे पैरो से
किंचित निराश नहीं होता वह छोटी बड़ी समस्या से
जीवन हो तो पंछी सा,कर्म पथ का पथिक है वो
साधक सा वो चलता रहता ,तनिक नहीं घबराता वो
कृष्णा की ✍️कलम से

0 टिप्पणियाँ