छपवा दो मेरे दर्द के किस्से
जमाना पढ़ भी लें तो क्या
उस तक तो पहुँचे ही नही
जिस तक चाहें थे पहुँचाने
बेखबर हैं मेरे जख्मों से
जो खुद उनके दिये हुये
अनजान होने का अभिनय
यूं आँखे चुराना अखरता हैं
दवा समझ ज़ख्मों पर लगाया
नमक बन दर्द इतना दे गया
हमने तो दर्दे दिल मिटाना चाहा
वो जुल्मी बढ़ा कर चला गया
मुड़कर देखा भी नही हमकों
कितने घायल हुये शब्द बाण से
हर साँस से आहें निकलती हैं
उस पत्थर दिल को नही सुनती हैं
रह रह कर टीस उठती हैं मन में
क्यों तोड़ा मेरा भरोसा एक पल में

0 टिप्पणियाँ