चाहती हूँ मैं भी तो ,नील गगन पर उडना
आशाओं ओर अभिलाषा को नित्य नया गढना 
सपनें है ये अपने है ये चाहूँ मैं इन्हें जीना 
कुछ नया सृजन करने को बहाकर अपना पसीना

देखूं जब भी पंछी को वो नित्य गगन में उडते
अपना दाना पानी लाने रोज सवेरे निकलते 
ना फिक्र उन्हें अपनी ,ना भाग्यवादी वो होते
केवल कर्म पथ पर बढते ओर पुरुषार्थ करते

सपने देखो चाहे प्रतिदिन, कर्म साथ ही करलो
किंचित संशय नहीं है, सपने साकार भी करलो
भाग्य तुम्हारी चौखट होगा,ओर सपने होगे तेरे
आसमान फिर तेरा होगा ,उडान के होंगे डेरे 
कृष्णा की ✍️कलम से