" क्या हुआ भाभी आप इतनी परेशान क्यों हैं"? लक्ष्मी ने पार्वती जी से पूछा पर उनके मन में भी यह विचार बार-बार उठ रहे थे कि, गार्गी ऐसा कौन-सा उपहार देना चाहती है अपनी सास को,
" लक्ष्मी मैं बहू के विषय में सोचकर परेशान हूं पता नहीं इसे क्या हो गया है यह पहले ऐसी बिल्कुल भी नहीं थी मेरी हर बात को सिर झुकाकर चुपचाप सुन लेती थी।पर अब यह व्यंग्यात्मकता लहज़े में बोलती है हर बात का जवाब देती है इसकी बातों से लगता है जैसे इसके मन में कोई रहस्य छुपा हुआ है" पार्वती जी ने परेशानी भरे लहज़े में कहा
" मुझे यहां तो सभी रहस्यमई लगते हैं अब इस घर में पहले जैसा कुछ भी नहीं है मुझे लगता है कि, भैया की मौत के बाद यहां सब कुछ बदल गया आपका व्यक्तित्व भी तो समझ नहीं आया मुझे जो अपनी ही बेटी का जीवन बर्बाद कर दे वह बहू के साथ अच्छा कैसे कर सकती है।
आपने गार्गी बहू के साथ कुछ ऐसा पहले किया होगा अब वह भी अपना बदला ले रही होगी यह हवेली तो मुझे घर कम षड़यंत्र का अड्डा ज्यादा लगती है" लक्ष्मी ने गम्भीर लहज़े में जवाब दिया।
" बुआ जी आप भी किसकी बातों में आ रहीं हैं जो जैसा होता है वह दूसरों को भी अपने जैसा समझता है। गार्गी भाभी कोई षड़यंत्र नहीं कर रहीं हैं यह डिपार्टमेंट तो मां के पास है इनके मन में चोर है इसलिए यह भाभी पर इल्ज़ाम लगा रहीं हैं चोर के दाढ़ी में तिनका वाली कहावत यहां चरितार्थ हो रही है" सुगंधा ने पार्वती की ओर नफ़रत से देखते हुए कहा।
" सुगंधा बिटिया मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा है कि, यहां क्या हो रहा है मेरे दिमाग ने अपना काम करना बंद कर दिया है" लक्ष्मी ने दुखी होकर कहा।
" बुआ जी आप परेशान न हों मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि जन्मदिन के दिन भाभी कुछ बहुत अच्छा राज़ खोलने वाली हैं। आपको पता है बुआ जी भाभी ने आपकी कालेज समय की सहेलियों को भी मां के जन्मदिन पर बुलाया है पापा के कुछ ख़ास दोस्त और दादा जी के साथ के मेहता और पाठक दादा जी को भी बुलाया है मां की कुछ ख़ास सहेलियां भी आएगी।उस रात पार्टी में ख़ास लोग ही शामिल होंगे कितना अच्छा लगेगा यह सब करना कोई षड्यंत्र रचना होता है"?? सुगंधा ने अपनी मां को घूरते हुए बुआ से कहा।
" तू सच कह रही है बिटिया क्या बहू ने मेरी सहेलियों को भी बुलाया है"?? लक्ष्मी ने आश्चर्यमिश्रित खुशी व्यक्त करते हुए पूछा।
" हां बुआ जी मैं बिल्कुल सच कह रही हूं मां पता नहीं क्या सयझ बैठी हैं" सुगंधा ने गम्भीर लहज़े में बताया
सुगंधा की बात सुनकर पार्वती जी के चेहरे का तनाव कम हो गया।
तभी वहां गार्गी आ गई वह बाहर से आई थी उसे देखकर लक्ष्मी ने कहा " बहू गार्गी सुगंधा बता रही थी कि तुमने भाभी की जन्मदिन की पार्टी में सभी पुराने जान-पहचान वालों को बुलाया है। यह सुनकर मैं बहुत ख़ुश हूं इसी बहाने पुरानी यादें ताजा हो जाएगी यह काम तो तुमने बहुत अच्छा किया" लक्ष्मी ने ख़ुश होकर गार्गी से कहा
गार्गी ने कहा कुछ नहीं बस मुस्कुरा वहां से चली गई।
" पार्वती जी के जन्मदिन की सुबह का दृश्य"
" मम्मा••••• मम्मा आप कहां हैं हम लोग आ गए तभी पलक की खुशी से चहकती हुई आवाज आई। मम्मा हम लोग भी आ गए हैं पीछे से काव्या और पारूल की आवाज सुनाई दी अपनी बेटियों की आवाज सुनकर गार्गी भागकर बाहर हाल में आई वहां अपनी बेटियों और दामादों को देखकर गार्गी खुशी से रो पड़ी।
बच्चों की आवाज सुनकर घर के सभी सदस्य वहां आ गए सभी बच्चों ने पार्वती, लक्ष्मी और रूद्र को प्रणाम किया लक्ष्मी ने सभी को अपने गले लगा लिया।
तभी काव्या ने कहा " मां आपने हम लोगों से यह क्यों पूछा कि, हम आपके फ़ैसले में आपके साथ हैं कि नहीं? मां आपको हम लोगों से यह पूछने की जरूरत नहीं है हम हमेशा आपके हर फैसले में आपके साथ हैं आप ने यह फैसला क्यों किया हम लोग यह भी नहीं पूछना चाहते आप जो भी करेंगी सही करेंगी" गार्गी की तीनों बेटियों ने एक साथ कहा और उनके पतियों ने भी उनका समर्थन किया।
" ऐसा क्या फैसला किया है गार्गी बहू तुमने जिसमें तुम्हारी बेटियां तुम्हारे साथ हैं"? लक्ष्मी जी ने हंसते हुए पूछा।
" शाम की पार्टी में आप को सब पता चल जाएगा बुआ जी" गार्गी ने हंसते हुए कहा
" ठीक है भई आज शाम तो धमाकों वाली शाम होगी" लक्ष्मी ने हंसते हुए कहा लक्ष्मी क बात सुनकर सभी के चेहरों पर मुस्कुराहट फ़ैल गई।
जन्मदिन की पार्टी की शाम
पूरी हवेली दुल्हन की तरह जगमगा रही थी, चारों तरफ़ ग़ुलाब बेला के फूलों की महक फैलीं हुई थी। पार्टी का पूरा इंतजाम बाहर गार्डन में किया गया था घर के सभी सदस्य बाहर गार्डन में मौजूद थे । पार्वती जी अपने रौबदार व्यक्तित्व के साथ बाहर गार्डन में सोफे पर बैठी हुई थीं, लक्ष्मी जी भी उनके बगल में बैठी हुई थीं। ठाकुर रूद्रप्रताप, गार्गी और उनकी बेटियां मेहमानों के स्वागत की तैयारियों में लगे हुए थे।
अब मेहमानों का आना शुरू हो गया सबसे पहले पार्वती जी क सहेलियां वहां आई जिन्हें देखकर पार्वती और लक्ष्मी के चेहरों पर मुस्कान फ़ैल गई क्योंकि दोनों अपने कालेज की सहेलियों को देखकर बहुत खुश हुई।
तभी हवेली में पुलिस कमिश्नर की गाड़ी ने प्रवेश किया पुलिस की गाड़ी देखकर पार्वती आश्चर्य से गार्गी को देखने लगी।
तभी वर्दीधारी ड्राईवर ने गाड़ी क दरवाजा खोला और गाड़ी से निकलने वाली संभ्रांत महिला को देखकर लक्ष्मी जी का चेहरा खुशी से चमकने लगा। परंतु उस महिला को देखकर पार्वती के चेहरे पर घबराहट दिखाई दी पर तुरंत उनके चेहरे
पर कठोरता छा गई।
उस महिला के साथ एक प्रभावशाली व्यक्तित्व का आदमी और एक औरत भी नीचे उतरे शायद वह व्यक्ति पुलिस कमिश्नर था और उसके साथ में उनकी पत्नी थी।
" गायत्री तुम यहां मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है" लक्ष्मी ने खुशी से चहकते हुए कहा और गायत्री से लिपट गई थोड़ी देर बाद जब वह दोनों अगल हुई तो गायत्री ने कहा " लक्ष्मी यह मेरा बेटा कृष्णा ठाकुर और इस शहर का पुलिस कमिश्नर है और यह मेरी बहू प्रेरणा है" तभी एक नीली बत्ती की सरकारी गाड़ी वहां आकर खड़ी हुई सभी की निगाहें उधर उठ गई गाड़ी में से एक सुदर्शन व्यक्तित्व का लड़का और सुंदर सी लड़की बाहर आए। वह दोनों गायत्री के पास आकर खड़े हो गए " लक्ष्मी यह मेरा पोता आराध्य ठाकुर है इस शहर का कलेक्टर और यह है आराध्य की मंगेतर दुर्गा ठाकुर यह इस शहर की एसपी है" गायत्री ने हंसते हुए अपने परिवार का परिचय कराया।
" गायत्री तुम्हारा तो पूरा परिवार ही सरकारी अफसर है पूरे शहर में बहुत इज्जत और सम्मान है तुम्हारे खानदान का, आज तेरे मान-सम्मान को देखकर मैं बहुत खुश हूं " लक्ष्मी ने खुशी जाहिर की ,
" लक्ष्मी यह तेरे भी तो बच्चे हैं इनको अपना आशीर्वाद दो, कृष्णा, आराध्य तुम सभी लक्ष्मी का पैर छूकर आशीर्वाद लो" गायत्री ने अपने बेटे बहू और पोते से कहा
तभी वहां गार्गी आ गई उसने गायत्री कृष्णा और प्रेरणा के पैर छुए आराध्य और दुर्गा ने गार्गी का पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
" गार्गी आज मैं बहुत खुश हूं तुमने मुझे अपनी सबसे प्यारी सहेली से मिलवा दिया तुम सदा खुश रहो तुम बहुत अच्छी हो" लक्ष्मी ने खुश होकर कहा।
" चलो गायत्री वहां कालेज की और सहेलियां आई है उनसे मिलते हैं"लक्ष्मी ने गायत्री का हाथ पकड़कर उन्हें लेकर अपनी सहेलियों के बीच पहुंची गायत्री को देखकर पार्वती के चेहरे का रंग बदल गया फिर उन्होंने स्वयं को संभाल लिया।
" गायत्री कालेज के बाद आज हम लोग मिल रहें हैं अपनी शादी में भी हम लोगों को नहीं बुलाया किस रजवाड़े में तेरी शादी हुई है क्या? बड़े ठाठ हैं तुम्हारे, बेटा पुलिस कमिश्नर पोता कलेक्टर पोते की होने वाली बहू एसपी क्या बात है भई"
गायत्री की सहेली प्रभा ने ईर्ष्यालु लहज़े में कहा
" यह तो है प्रभा!! ईश्वर सबके जीवन में खुशियों की बहार लाते हैं तुम लोग कालेज में गायत्री से बात करना भी पसंद नहीं करतीं थीं और आज देखो सभी उसके आसपास खड़े हो इसे कहते हैं समय का फेर, भाभी देखिए आज गायत्री के क्या ठाठ बाट हो गए हैं" लक्ष्मी जी ने पार्वती को संबोधित करते हुए कहा
पार्वती जी गायत्री को देखकर परेशान हो गई पर चेहरे पर नक़ली मुस्कान लेकर गायत्री से मिली, कृष्णा ठाकुर को देखकर वह चौंक गई क्योंकि कृष्णा ठाकुर के चेहरे पर उन्हें अपने पति अर्जुन ठाकुर की झलक दिखाई दी,
तभी भवानी ठाकुर अपने बेटे के साथ वहां आ गए गार्गी ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। वहां मेहमानों में गायत्री को देखकर भवानी ठाकुर के चेहरे पर आक्रोश दिखाई दिया पर उन्होंने अपने चेहरे के आते-आते भावों पर तुरंत ही काबू पा लिया।
अपने पिता को देखकर पार्वती उनके पास आशीर्वाद लेने के बहाने आई तब भवानी ठाकुर ने गुस्से में पूछा " यह गायत्री यहां क्यों आई हैं इसे किसने बुलाया है"
" पिताजी गार्गी ने बुलाया है गायत्री अब कोई साधारण औरत नहीं है वह यहां के पुलिस कमिश्नर की मां और कलेक्टर की दादी है और लक्ष्मी की सबसे अच्छी सहेली इसलिए मुझे उसको अपनी हवेली में सम्मान देना ही पड़ेगा आप भी ऐसी कोई बात न कीजिएगा जिससे गायत्री का कोई अपमान हो " पार्वती जी ने धीरे से कहा
तभी एक और गाड़ी ने हवेली में प्रवेश किया उसमें से जो उतरा उसे देखकर पार्वती जी और रूद्रप्रताप के चेहरे पर घबराहट दिखाई देने लगी वह और कोई नहीं रूद्रप्रताप की प्रेमिका सुनैना थी। सुनैना को देखकर गार्गी ने आगे बढ़कर सुनैना का स्वागत किया।
लेकिन वहां बैठी हुई पार्वती जी की सहेलियों में से एक ने कहा " गार्गी बहू क्या तुमने इस औरत को यहां बुलाया है"? हां प्रभा मौसी यह मेरी सहेली है हम लोग कालेज में एक साथ थे जब मैंने मां जी की सहेलियों को बुलाया तो मैंने सोचा कि, मैं अपनी सहेली को भी बुला लेती हूं लेकिन आप क्यों पूछ रही हैं"? गार्गी ने अंजान बनते हुए पूछा
" शायद तुम्हें पता नहीं है बहू इसलिए तुमने इसे यहां बुलाया है अगर तुम इसकी असलियत जानती तो इसे यहां कभी न बुलाती" प्रभा जी ने हिमायती बनते हुए कहा।
तभी रूद्रप्रताप ने गार्गी के पास आकर धीरे से फुसफुसाते हुए कहा " तुमने सुनैना को यहां क्यों बुलाया है गार्गी मुझे लगता है कि तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है तुम हमारे खानदान की मान मर्यादा को खंडित करने की कोशिश कर रही हो मैं तुम्हें इसके लिए कभी क्षमा नहीं करूंगा" रूद्रप्रताप ने गुस्से में धीरे से कहा।
" अभी तो मैंने आप की मान मर्यादा पर कोई कुठाराघात किया ही नहीं ठाकुर साहब आप और आपकी माताजी परेशान न हों अभी थोड़ा समय है आपकी मान-प्रतिष्ठा को कलंकित होने में क्योंकि अपने कर्मों का फल तो हर व्यक्ति को मिलता है वह आप को भी मिलेगा" गार्गी ने नफ़रत से दांत पीसते हुए धीरे से मुस्कराते हुए कहा और वहां से आगे बढ़ गई।
गार्गी सुनैना का हाथ पकड़कर वहां लेकर गई जहां सभी लोग बैठे हुए थे गार्गी ने सुनैना को बैठने के लिए कहा । सुनैना जैसे ही वहां बैठने लगी प्रभा जी और मिसेज पांडे ने गुस्से में कहा "गार्गी यह औरत हम लोगों के बीच में नहीं बैठ सकती"
" गार्गी बहू तुमने मेरा जन्मदिन मनाने के लिए यहां सभी को बुलाया है तो फिर रंग में भंग डालने के लिए अपनी इस सहेली को यहां क्यों बुलाया है"?? पार्वती जी ने गुस्से में पूछा
" मां जी यह आप भी जानती हैं कि, सुनैना किसकी सहेली है मेरी या आपके बेटे की कहिए तो मैं अभी सबूतों के साथ सबके सामने एलान कर दूं"
गार्गी ने धमकी भरे शब्दों में धीरे से कहा
पार्वती जी अभी कुछ और कहती तभी रूद्रप्रताप के दोस्त एडवोकेट शेखर शुक्ला अपनी पत्नी के साथ वहां पहुंचे उनके साथ एक 18-20 साल का एक सुन्दर सा लड़का भी था।
शेखर और उसकी पत्नी मालती सभी के साथ आकर खड़े हो गए उस लड़के ने आते ही पहले गार्गी के पैर छुए फिर सभी को प्रणाम किया।
उस लड़के को देखकर पता नहीं क्यों सुनैना के चेहरे पर दर्द की लकीरें उभर आई।
" मेरा काम हुआ या नहीं शेखर भैया" गार्गी ने मुस्कुराते हुए धीरे से पूछा
" हो गया है भाभी लेकिन आप एक बार फिर से अपने फैसले पर विचार कर लीजिए" शेखर ने धीरे से कहा।
गार्गी ने कोई जवाब नहीं दिया और वह आगे बढ़ गई उसने सभी मेहमानों को संबोधित करते हुए कहा " आप सभी लोग मेरे निमंत्रण पर यहां आए इसके लिए मैं आप सभी का दिल से आभार व्यक्त करतीं हूं आज मेरी सासू मां का जन्मदिन है आज का दिन उनके जीवन का सबसे स्वर्णिम दिन बन जाएगा क्योंकि मैं अपनी मां जी को ऐसा अनमोल उपहार दूंगी जिसे पाकर वह खुशी से झूम उठेगीं।
" आइए मां जी केक काटिए" गार्गी ने मुस्कुराते हुए पार्वती जी से कहा पार्वती जी केक काटा पूरा पांडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
सभी लोग अपने अपने स्थान पर बैठ गए वेटर सभी मेहमानों को खाने-पीने का सामान सर्व कर रहे थे मधुर संगीत बज रहा था पूरा वातावरण ही संगीतमय हो उठा था वहां सभी लोग पार्टी का आनंद उठा रहे थे।पर पार्वती, रूद्रप्रताप और भवानी ठाकुर के चेहरे पर तनाव दिखाई दे रहा था।
तभी गार्गी ने मुस्कुराते हुए कहा " मां जी मैंने अभी आपसे कहा था कि, मैं आपको बहुत ही अनमोल उपहार दूंगी।पर अब मैंने अपना विचार बदल दिया है अब मैं आप से पूछ रही हूं कि, मैं आपको आपके जन्मदिन पर क्या उपहार दूं बता दीजिए"
" तुमने तो बड़े गर्व के साथ कहा था कि, तुम मुझे ऐसा उपहार दोगी जो मेरे लिए अनमोल होगा फिर अब क्या हुआ तुम मुझसे मेरी पसंद क्यों पूछ रही हो क्या तुम मेरे लिए तोहफ़ा अभी तक नहीं लाईं हो । बातें तो बहुत बड़ी बड़ी कर रही थीं लगता है कि, तुम्हारी कथनी और करनी में अंतर है चलो कोई बात नहीं अब अगर तुम मुझसे मेरी पसंद के तोहफ़े के विषय में पूछ रही हो तो बता दूंगी कि, मुझे क्या पसंद है पर मैं यह जानती हूं कि,अब वह तोहफ़ा देना तुम्हारे वश में नहीं है" पार्वती जी ने व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट के साथ अंहकार भरी आवाज में कहा।
" आप बताइए तो शायद जो आप मुझसे मांगें वह मैं आपको दें दूं" गार्गी ने भी गहरी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया।
" पार्वती अगर बहू इतने प्यार से पूछ रही है तो तुम अपनी पसंद बता दो अब बहू तुम्हारी पसंद का तोहफ़ा दे पाएगी या नहीं यह तो तुम्हारे मांगने के बाद पता चलेगा" भवानी ठाकुर ने जहरीली मुस्कुराहट के साथ कहा
" तो ठीक है मैं तुम्हें बता देती हूं कि मुझे क्या चाहिए तुम मुझे इस खानदान का वारिस दे दो" पार्वती जी ने व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट के साथ कठोर शब्दों में कहा
पार्वती जी की बात सुनकर वहां सन्नाटा छा गया सभी लोग आश्चर्यचकित होकर पार्वती जी का चेहरा देखने लगे वहां बैठे सभी लोगों को लग रहा था कि, पार्वती जी कहीं पागल तो नहीं हो गई हैं जो गार्गी से इस उम्र में खानदान का वारिस मांग रही हैं।पर पार्वती के पिता के चेहरे पर जहरीली मुस्कुराहट फैलीं हुई थी।
" तथास्तु मां जी मैं आपको अभी इसी वक़्त इस खानदान का वारिस देती हूं"
वहां बैठे सभी के मुंह से एक साथ निकला
क्या•••• ????
क्रमशः
डॉ कंचन शुक्ल
स्वरचित मौलिक

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