मुनिया की आंखों से हर रोज आंसू निकले। बच्चों के सामने साहसी बनी रहती। पर जब भी अकेले में होती, रामू की याद उसे विकल कर देती। रामू इतना भोला और सीधा था कि सभी उसकी मजाक बनाते थे। पास के शहर में भी वह कभी अकेला नहीं जाता था। आज रामू अकेला परदेश चला गया। परदेश में कैसे रह रहे होंगें। खाना खाया या नहीं। वहाॅ उनकी पसंद का खाना कहाॅ मिलेगा। सचमुच पत्नी के कई रूप बताये हैं। पत्नी पति की सहधर्मिणी होती है। जरूरत के अनुसार दोस्त, सलाहकार और चिंता करने में एकदम माॅ जैसी कही जाती है। अब रामू भले ही कितना भी सीधा हो, कौन सा अकेला परदेश गया है। उसके साथ गांव के भी तीन और लङके गये हैं। परदेश में भी सारी व्यवस्था कंपनी की है। फिर दूसरी जगह कुछ दिन तो अलग लगेगा ही। जल्द ही सब अभ्यास हो जायेगा। पर इस तरह की बातें मुनिया के मन में न जाने क्यों नहीं आ रही थीं।
रामू और दूसरे लङकों को गये पंद्रह दिन निकल गये थे। पर कोई खबर नहीं आयी। मुनिया दूसरे लङकों के घर भी बात करने गयी। मुनिया का यही उतावलापन किसी को पसंद नहीं आता था। कंपनी ने उन्हें विदेश पानी के जहाज से भेजा है। कोई ऐरोप्लेन नहीं है कि आज बैठे और दूसरे दिन पहुंच गये। अभी तो लङके रास्ते में ही होंगें। पहुंचकर चिट्ठी लिखेंगे। सुना है कि फोन पर बात करना बहुत मंहगा होता है। विदेश से चिट्ठी भी आने में समय लगता है।
मुनिया एकदम खिसिया गयी। सबसे पहले तो उसे उन लङकों के घर बालों पर गुस्सा आया। अरे आराम से भी बता सकते हैं। कह सकते हैं कि देख मुनिया.. ।तू परेशान मत हो। अभी रास्ते में होंगें।
फिर रामू पर बहुत गुस्सा आया। गुस्से की खास बजह थी। उसे मुनिया को पूरी बात बतानी चाहिये थी। बताना था कि पानी के जहाज से जा रहे हैं। पंद्रह से बीस दिन पहुंचने में लग जाते हैं। फिर चिट्ठी लिखूंगा। दूसरे लोग भी तो अपने घर में पूरी बात बताकर गये हैं।
एक महीने से कुछ ऊपर हो गया। एक दिन डाकिया ने रामू का खत लाकर दिया। मुनिया भले ही ज्यादा पढी न थी पर खत पढ लेती। रामू ने खुद का समाचार विस्तार से बताया। परदेश की खूबसूरती पर भी बहुत लिखा। मालिक के बारे में भी लिखा कि बङे भले आदमी लगते हैं। वैसे रामू मालिक की भाषा ही नहीं समझ पाया। पर रामू और दूसरे लोगों के लिये रहने और खाने की अच्छी व्यवस्था की गयी है। फिर मुनिया को हिम्मत रखने का संदेश था। वेतन मिलते ही वह वेतन भिजबा देगा।
आज मुनिया ने चैन से खाना खाया। जिंदगी पटरी पर चलने लगी। हर महीने रामू वेतन भी भेजता था। पर पूरे वेतन से बहुत कम। ५००० रुपये रोज की मजूरी पर गया आदमी अगर महीने में दस या पंद्रह हजार रुपये भेजे तो बात समझ नहीं आती। आखिर परदेश में ज्यादा पैसे रखने से क्या फायदा। फिर भी रामू जो भेज रहा था, वह भी बहुत ज्यादा था। शायद पूरे महीने मजूरी करने पर भी गांव में इतना न मिलता।
मुनिया महसूस कर रही थी कि कुछ तो गङबङ है। अब रामू की चिट्ठी भी संक्षिप्त होती जा रही थी। दो चार पंक्तियों में लिख देता कि अपना ध्यान रखना। वेतन भेज रहा हूं। आखिर क्या बजह है इस बेरुखी की। मुनिया विचार करके भी समझ न पाती।
वक्त आगे बढता रहा। मुनिया को कोई कमी तो नहीं रही ।पर जिस ऐश्वर्य की आशा से उसने रामू को परदेश भेजा था, वह भी नजर नहीं आ रहा। अब तो दूसरे बच्चों के घर बाले भी परेशान थे। सभी की एक सी हालत थी। आखिर चार साल बीतने को आ गये। इस बार रामू का खत कुछ बङा आया।
" मुनिया।
कैसे बताऊं कि चार साल किस तरह काटे हैं। हम सभी के साथ धोखा हुआ है। जो हम घर पर भेज रहे हैं, हमें बस उससे थोङी ज्यादा तनख्वाह मिलती। वापस हम आ नहीं सकते थे। तुझे सच बता नहीं सकते थे। अब थोङे दिन और सब्र करो। वनवास खत्म कर हम वापस आ रहे हैं।
तुम्हारा रामू। "
खत पढते ही मुनिया बेतहाशा रोने लगी। दूसरे घरों में भी खबर पहुंच गयी। लङकों को कंपनी बालों ने पागल बनाया था। चार साल बेगार करायी है। अब हो ही क्या सकता है। सभी की अक्ल पर पत्थर पङे थे। अब तो ईश्वर से यही प्रार्थना है कि बच्चे वनवास खत्म कर वापस आ जायें।
पर ईश्वर को शायद यह मंजूर नहीं था। चार साल बीतने पर भी रामू और दूसरे लङके नहीं आये। फिर कोई खबर नहीं आयी। रामू और दूसरे लङकों का वनवास अज्ञातवास में बदल गया। रामू के आखरी खत के आधार पर जिले के अधिकारियों को सूचना दी गयी। कुछ दिन समाचार चैनलों की चहल पहल रही। लंबी लंबी खबरें न्यूज चैनलों पर चलाई गयीं। काफी राजनीति भी हुई। फिर सब भूल गये। मुनिया और दूसरे परिवारों के भाग्य में रोना और इंतजार करना ही लिखा था। इंतजार चलता रहा। दिन, महीने और सालों बीत गये। यहाँ तक कि मुनिया के बच्चे भी बङे हो गये। बङी लङकी पढाई में बहुत होशियार रही। काफी पढाई करके भी किसी बङी परीक्षा की तैयारी कर रही है। मुनिया ज्यादा तो जानती नहीं पर इतना समझ गयी है कि परीक्षा पास करके लङकी बङी अधिकारी बन जायेगी। लङका भी इंटर पास कर इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहा है। अकेले होकर भी मुनिया ने बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी तो यह खुद आश्चर्य की बात है। इसके लिये मुनिया ने जो मेहनत की, उसे चंद पंक्तियों में लिखा नहीं जा सकता। सही बात है कि स्त्री कुछ ठान ले तो उसके लिये कुछ भी नामुमकिन नहीं।
क्रमशः अगले भाग में....
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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