ना बुलन्दिया बची ,ना बचे अरमान
तेरे शहर में तलाश भी है अब बेजान
🌷🌷🌷🌷🌷🌷
क्यों पूछते हो दूसरो से,अंधेरे का कारण
थोडी रोशनी के लिए जला दिये अपने घर मकान
🌷🌷🌷🌷🙏🙏
अब ढूंढते हो दरख्तो पर पंछियों के साये
अरे घोंसले बनाएं कहाँ, उजाड दिये खलिहान
🌷🌷🌷🌷🌷🌷
इश्क़ अब इबादत नहीं रहा किसी का
ना रहे वो रिवाज दो जिस्म एक जान
🌷🌷🌷🌷🌷
जिन्दगी मुकम्मल हो भी सकती थी मेरी
तलाश में भटक गयी ,न थी मंजिल आसान
🌷🌷🌷🌷🌷🌷
ऊम्र की उधडने लगी बखिया, ना मैं हसीन रही
बस तलाश वजूद की, जीती रही निज स्वाभिमान
कृष्णा की ✍️कलम से

0 टिप्पणियाँ