ना बुलन्दिया बची ,ना बचे अरमान
तेरे शहर में तलाश भी है अब बेजान 
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क्यों पूछते हो दूसरो से,अंधेरे का कारण
थोडी रोशनी के लिए जला दिये अपने घर मकान
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अब ढूंढते हो दरख्तो पर पंछियों के साये
अरे घोंसले बनाएं कहाँ, उजाड दिये खलिहान 
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इश्क़ अब इबादत नहीं रहा किसी का
ना रहे वो रिवाज दो जिस्म एक जान 
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जिन्दगी मुकम्मल हो भी सकती थी मेरी
तलाश में भटक गयी ,न थी मंजिल आसान 
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ऊम्र की उधडने लगी बखिया, ना मैं  हसीन रही
बस तलाश वजूद की, जीती रही निज स्वाभिमान  
कृष्णा की ✍️कलम से