यह एक पूर्ण काल्पनिक कहानी है। इसका इतिहास की किसी भी घटना से सीधा सीधा कोई संबंध नहीं है। यदि किसी भी पात्र या घटना का किसी से भी संबंध पाया जाता है तो वह मात्र एक संयोग होगा ।
गंगा के किनारे की उपजाऊ जमीन पर बसी छोटी सी रियासत बाहनपुर सुख और समृद्धि का प्रतीक थी। उपजाऊ जमीन और सिचाई के भरपूर साधन होने के कारण धन धान्य की कोई कमी न थी। छोटे मोटे अनेकों घरेलू उद्योग भी विकसित थे। रियासत में कोई भी भिखारी नहीं था। कोई भी कर्जदार नहीं था। देखने पर रियासत में कोई कमी न लगती। पर शायद एक कमी थी। वह थी आत्मसम्मान की। आजादी की कमी। खुद निर्णय ले सकने की कमी। पर ऐशोआराम के मोह में इन कमियों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। वैसे भी दुनिया तो आनंद का पर्याय है। जब सारी सुख सुविधाएं मिल रही हैं तो फिर दिक्कत क्या है। यदि जेल में बंद कैदी को इतने सुख मिलने लगें जो कि मेहनत से भी दुर्लभ हों तो भला कौन आजाद होना चाहेगा।
वैसे राजा सौदान सिंह की औकात अंग्रेजी हुकूमत के पालतू कुत्तों से बढकर न थी। फिर भी अपनी अय्याशी के मद में उन्हें इसमें भी कोई कमी न लगती। वैसे भी गुलाम कौन नहीं है। संसार में सभी तो गुलामी करते हैं। जो दरबान उनके सामने सर झुकाये खड़े रहते हैं, क्या वह गुलामी नहीं करते। क्या वह अपने दरबारियों को अच्छी तरह फटकार नहीं लगाते। वास्तव में संसार का यही नियम है कि किसी भी तरह जीकर दिखाइये। शक्तिशाली अधिकार से जीते हैं तो कमजोर गुलामी करके जीते हैं। हर शेर के ऊपर एक बब्बर शेर होता है। जो कमजोरों से गुलामी कराता है, उसे भी किसी न किसी की गुलामी करनी होती है। क्या ये अंग्रेजी अफसर किसी की गुलामी नहीं करते। करते हैं। वे भी तो बरतानिया महारानी के आदेश पर खड़े हो जाते हैं। महारानी के एक आदेश पर किसी को भी कहीं भेज दिया जाता है।
कभी भारत पर मुहम्मद बिन कासिम ने हमला किया था। कासिम था कौन। वह भी तो अरब के खलीफा का गुलाम ही तो था। पूरे सिंध में तबाही मचाकर सारा कुछ नष्ट कर देने बाला वह मुहम्मद बिन कासिम अपने रहनुमा के आदेश पर जिंदा ही सूखी खाल में सिल दिया गया। तिल तिल कर तड़पकर उसके प्राण निकले।
समझदारी यही है कि गुलामी की इस प्रक्रिया को अपनी शक्ति समझते हुए चुपचाप निभाया जाये। विरोध करने पर शान शौकत के अलावा अपने प्राणों से भी हाथ धोना पड़ता है। इस तरह अपने गुलामों पर तरह तरह से हुक्म करने बाले राजा सौदान सिंह अंग्रेजी अफसरों के सामने गुलामी के धर्म का चुपचाप पालन करते।
जब सूरज अस्त हो जाता है, उस समय भी दीपक की ज्योति कुछ न कुछ प्रकाश करती रहती है। शायद वह प्रतीक्षा करती है कि फिर से सूर्योदय हो तथा संसार फिर से प्रकाश से भर जाये। लगता है कि कभी कभी दीपक की ज्योति को भी केवल रात्रि प्रकाश से बढकर भी कुछ करना होता है। कई बार ज्योति सूरज को बताती है कि तुम्ही तो वह सूरज हों जिसके उदित होने की प्रतीक्षा दुनिया देख रही है। तुम ही तो गुलामी के अंधकार को खत्म करने बाले सूर्य हों। तुम मालिक हों न कि गुलाम। खुद के लिये तो सभी जीते हैं पर दूसरों के लिये अपने प्राण भी दाव पर लगाने बाले ऐसे तुम ही तो हों।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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