आज हर हाल में ढलना, बहुत जरूरी है।
वक़्त के साथ में चलना, बहुत जरूरी है।।
इन हवाओं को बदलना, तो नहीं है मुमकिन।
साथ में इनके बदलना, बहुत जरूरी है।।
आप सोने की तरहां, चाहते हो अपनी चमक।
फ़र्ज़ की आग में गलना, बहुत जरूरी है।।
इन फिजाओं में बहक, जाए ना ये दिल अपना।
दिल के अरमान मसलना, बहुत जरूरी है।।
गल्तियां हो चुकी हैं , उनको भुला दीजे अब।
आपको पाक निकलना , बहुत जरूरी है ।।
ये दशहरे का पर्व , हमको ये सिखाता है।
दिल के रावण का भी, जलना बहुत जरूरी है।।
रोजगारी का इंतजाम , कीजिए रावत ।
इन गरीबों का भी पलना , बहुत जरूरी है ।।
रचनाकार ✍️
भरत सिंह रावत
भोपाल मध्यप्रदेश

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