राजा "सूर्य प्रताप" की एक सौ आठ रानी थी।
पर संतान सुख नहीं मिला।
एक दिन कुछ सैनिक को साथ लेकर राजा शिकार खेलने गए। हिरनी का पीछा करते करते वो बहुत ही दूर निकल गए।
भूख प्यास से मन व्याकुल हो उठा।
जंगल में रास्ता भटकने के कारण और ज्यादा परेशान हो गए।
पूरे दिन खत्म होने के बाद रात्रि में राजा को चिंता होने लगी।
कहां और कैसे रहेंगे इस जंगल में।
सूरज डुबने के बाद राजा और ज्यादा भूख प्यास से बेहाल हो गए।

दो दिन तक जंगल मैं भटकते रहने के कारण दोपहर के समय जब सूर्य सर पर पहुंच गया। तो राजा मूर्छित होकर गिर पड़े।
होस आने पर देखा जंगल मैं ही एक कुटिया में एक सुंदर कन्या उसके सेवा में लगी थी।
उन्होंने कहा तुम कौन हो
कन्या ने कहा मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है।
इसलिए इस जंगल में रहती हूं। इस जंगल के सारे जीव हमारे दोस्त और परिवार है।


राजा उसके मुख देख कर ही अपने होश खोने लगा।
इतनी सुंदर कन्या उसने आज तक नहीं देखा था।

राजा ने पूछा। तुम कौन हो क्या मुझसे विवाह करोगी।
कन्या को विवाह शब्द के बारे में भी कुछ नहीं पता था।
दोनों ही कुछ दिन उस जंगल में साथ साथ रहने के बाद राजा उसे लेकर अपने राज्य वापस आ गए।
और उससे शादी कर ली।उसका नाम रखा रजनी,।
राजा के सब रानी मैं से एक रानी सुरेखा, बहुत ही सुंदर हर काम मैं निपुण, राजा सुरेखा से परामर्श लेकर ही कोई काम करते थे। 
पर जब सुरेखा ने देखा राजा रात दिन रजनी के साथ व्यतीत करने लगे।
तो सुरेखा को रजनी से डाह होने लगी।
रोज नयी नयी युक्ती लगाने लगी। रजनी को अपने रास्ते से हटाने का। 
कभी घूमते घूमते जंगल मैं छोड़ कर आ जाती।तो कभी।सपरे को बुलाकर सांप उसके कमरे मैं छुड़ा दिए।
पर जो रोज ही जंगल में सांप बिच्छू के साथ रही हो उसके उपर कोई प्रभाव कैसे पड़ता, 
कुछ दिन बाद रजनी गर्भवती हो गयी।अब तो राजा के खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा वर्षों बाद उनके कानों ने ये आवाज़ सुना था। 
राजा रजनी का ध्यान खुद रखने लगे।
ये देख रानी सुरेखा को, रजनी से और डाह होने लगी।
राजा से कहा हमें बहुत ही प्रसन्नता हुई।
रजनी के कारण हम सबको मां बनने का सौभाग्य मिलेगा। 
आप रजनी की चिंता मत कीजिए में हर पल हर क्षण उसके साथ रहूंगी। और उसकी देखभाल  करूंगी। हमारे राज्य का दीपक आ रहा है हम बहुत ही ज्यादा प्रसन्न है ।हम नहीं चाहते उसे थोड़ी सी भी कष्ट झेलना पड़े। राजा को यह सुनकर बहुत ही प्रसन्नता हुई।
रानी सुरेखा उनका ध्यान रखेंगी उन्हें सुरेखा के उपर पूर्ण रूप से  विश्वास था। 
उन्होंने दास दासियों से कहा हर पल सुरेखा के परामर्श मैं  रजनी का ध्यान रखें ।और वह अपने कामकाज में उलझ गए।
रजनी को तो कुछ पता ही नहीं था ।जैसा जैसा सुरेखा कहती वो वही करती एक दिन जब प्रसव पीड़ा से छटपटाने लगी तो रानी सुरेखा से कहा। रानी सुरेखा ने कहा।
तुम उखल में सर रखो ऐसे ही  बच्चे का जन्म होता है ।रजनी को तो कुछ पता ही नहीं था। रजनी ने वैसा ही किया सर को उखल में रखकर दर्द से छटपटाने लगी।जब बच्चे ने जन्म लिया तो रानी सुरेखा पहले से ही सब तैयारियां कर रखी थी। बच्चे को ले जाकर दासियों से कहा जंगल में छोड़ कर आओ ।और जोर जोर से चिल्लाने लगी रजनी ने मरे हुए  बच्चे  को जन्म दिया है। रजनी को बहुत दुःख हुआ। और राजा तो चुप ही हो गए। उनकेे भाग्य मैं संतान सुख नहीं है तभी मरा हुआ पुत्र ने जन्म लिया । इधर दासी बच्चे को लेकर जंगल मैं छोड़ आईं।
जंगल मैं जानवरों के बीच भी बच्चा बहुत ही खुश था।
आखिर बच्चे का ननीहाल था।
बच्चे को नहीं पता था पर जंगल के जीव जंतु, तो पहचान गए थे।
एक दिन राजा शिकार खेलने जंगल गए तो उन्होंने बहुत सारे जानवरों के साथ अपने बच्चे को खेलते हुए देखा।उनको बहुत ही आश्चर्य हुआ।
और खुशी भी।
जब बच्चे के नजदीक आने लगे सारे जानवर पीछे हट गये। 
राजा ने बच्चे को गोद मैं उठाया तो उन्हें बहुत ही प्रसन्नता हुई।
उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्होंने अपने पुत्र को गोद में उठाया है।
राजा बच्चे को लेकर राजमहल लौट आए।
और अपने सेवकों को आदेश दिया। पता करो अपने राज्य या आसपास के राज्यों मैं कोई स्त्री गर्भवती थी। और उसने बच्चे को जन्म दिया हो।
सेवक ने आकर कहा नहीं कोई स्त्री गर्भवती नहीं थी। 
और जो भी थी उनके बच्चे उनके साथ ही है।
फिर राजा ने अपनी उस दासी को बुलवाया।
जिसने उसके मरे हुए बच्चे को जंगल में गाड़ कर आने को कहा था।
दासी जब राजा के सामने आई चेहरा पीला पड़ गया।
राजा को आसंका होने लगी। फिर सख्त कार्रवाई करने पर दासी ने सब कुछ ठीक ठीक कह सुनाया।
फिर राजा ने दासी को कहा इस बात को किसी को मत बताना जाओ।
राजा को ऐसा डर लगने लगा अगर उसने किसीको भी बताया उनका पुत्र जीवित है तो फिर से कोई दुश्मन उनके पुत्र को मारने का प्रयास कर सकता है। 
इसलिए राजा ने उसे पाला पर सब को यही बताया।ये बालक हमारा पुत्र नहीं है।
हमें जंगल में मिला था। राजा को दूसरे बच्चे के साथ इस प्रकार का व्यवहार प्रजा मैं उनका स्थान देवता स्वरूप हो गया।
राजा ने अपने पुत्र का नाम दिग्विजय रखा और रानी रजनी के गोद मैं रख कर कहा,आज से ये हमारा पुत्र है
दिग्विजय को यह कभी भी पता ना चले कि यह इस महल का राजकुमार नहीं है। इसका  लालन-पालन एक राजकुमार की भांति ही करना।
रानी रजनी पुत्र को पाकर बहुत ही प्रसन्न हुई ।और बच्चे के साथ खुशी पूर्वक रहने लगी। इस प्रकार अपने बच्चे के साथ रहकर भी उसे  कभी ये पता नहीं चला  दिग्विजय उसका पुत्र है ।
राजा को छोड़कर बाकी सब को यही लगा दिग्विजय राजा का पुत्र नहीं बल्कि उन्होंने उसे गोद लिया है।
                समाप्त

या कहानी पूर्ण रूप से काल्पनिक है त्रुटियों लिए क्षमा चाहती हूं।

                         अम्बिका झा ✍️