जुबां पे शहद और हाथों में कटार रखते हैं 
मेरे शहर के लोग , ऐसे ही इकरार करते हैं 

जितना अपनापन दिखाया उतना ही लूटा 
बड़े भोले हैं , रिश्तों में भी व्यापार करते हैं 

आधुनिक दिखने को संस्कार भी तज दिये 
छोटे बच्चे भी मां बाप का तिरस्कार करते हैं 

संवेदनाएं अब तो शायद मर गई हैं ए "हरि" 
अब तो केवल पैसों से ही सरोकार रखते हैं 

कानून नाम का डर हमें कहीं दिखता नहीं 
जो भी करना है सब खुले बाजार करते हैं 
हरिशंकर गोयल "हरि"