हां तो हम क्या कह रहे थे? हमारे साथ वाला भी अंदर रुका ही नहीं। नकलची कहीं का । जैसे ही हम बाहर आए दो मिनट बाद वो भी बाहर निकल आया। शायद वो बोर हो रहा था वहां।

लेकिन हमें एक बात समझ में नहीं आई। जब मैं बाहर आई थी तो दादी सा खूब गुस्सा कर रही थी । हमें करम जली, निगोडी और न जाने क्या क्या कह रही थी। हमें उनका मतलब तो समझ में नहीं आया था ।कैसे समझ में आता, हम कुछ ही मिनट के तो थे। लेकिन इतना जरूर जान गए थे कि वो जरूर कोई खराब चीज होती है वरना दादी सा गुस्सा नहीं करती । और हमें गोद में जरूर लेती।
हम तो इतने सुंदर हैं  ,गोरे चिट्टे है  जब हमें दादी सा ने गोद में नहीं लिया तो इसे तो बिलकुल नहीं लेंगी। क्योंकि ये तो इतना कमजोर है। दुबला पतला झींगुर की तरह। और देखने में उतना अच्छा भी नहीं लगता। दादी सा तो पक्का इसको भी वो सब कहेंगी जो हमें कह रही थी । क्या था वो ..... अरे हां .. करमजली .... निगोडी ....।

लेकिन ये क्या? जैसे ही वो बाहर आया डॉक्टर तो खुशी से उछल पड़ी।( हुंह... हमारे आने के समय तो मुंह लटका लिया था।)। और जल्दी से बाहर निकल कर आई और  दादी सा को बधाई दी। और तब तक थाली बजाती हुई एक औरत आई और आंगन में गोल गोल घूमने लगी और साथ साथ बोलती भी जा रही थी।

"बधाई हो हुकुम... नन्हें राजपूत आएं हैं। आपके खानदान के चिराग आएं हैं। अब तो मैं जड़ाऊ कंगन लूंगी आपसे। इनकार नहीं सुनूंगी।"

और  उस डॉक्टर ने जैसे ही दादी सा को खुशी खुशी ये खबर सुनाई दादी सा तो वहीं कमरे में नाचने लगी। और तुरंत अपने गले की चेन उतार कर उनको दे दी। इसके बाद उसको गोद में उठाकर चूम लिया । मेरा दिल भर आया । मैं तो बस टुकुर टुकुर देखे जा रही थी। मुझे क्यों नहीं लिया गोद में, इसे क्यों लिया? मुझमें क्या कमी है। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। काश भगवान जी थोड़ी सी बुद्धि भी साथ में दे देते। लेकिन उन्होंने तो केवल मुझे रोना ही सिखाया था अब तक।

"इस छोरी को भी गोद में ले ले बहुरानी और थोड़ी सी शहद चटा दे। आखिर भागोवाली है छोरी, भाई लेकर आई है अपने पीछे पीछे।बड़ी बहन हैं मारे राजपूत की । लेकिन एक बात का ध्यान रखना आप। छोरी को अपना दूध ज्यादा मत पिलाना। जब हमारे लाडेसर का पेट भर जाए तो उसे पिलाना "। और दादी सा वहां से चली गई।

उनके जाते ही मां साहेब ने लपक कर मुझे गोद में ले लिया। हम उनके आंचल में छिप गए। पहली बार किसी ने हमें इतने प्यार से गोद में लिया था। भगवान जी ठीक कहते थे । मां उनका दूसरा रूप है। मां साहेब ने हमें भरपेट अपना अमृत पिलाया। और हमें प्यार करते हुए कहने लगी।

"हमारी लाडो है आप, हम आपके साथ कोई भी भेदभाव नहीं होने देंगे , और ना हम खुद करेंगे। आपको भी आपका पूरा हक मिलेगा । ये हमारा वचन है आपसे।"

अब हमारी समझ में इतना तो आ ही गया था कि  जो हमारे साथ अंधेरी दुनिया से बाहर आया था वो हमारा भाई था। और हम उसकी बड़ी बहन। दादी सा ने यही तो कहा था मां साहेब से।और भाइयों को ज्यादा प्यार किया जाता है। लेकिन मां साहेब ने तो हमको वचन दिया है कि वो हमें भी हमारे भाई के बराबर प्यार देंगी। और हम निश्चिंत होकर उनकी गोद में सो गए।

सुबह सुबह जब हमारी नींद खुली तो मां साहेब दर्द से कराह रही थी और उनको  एक आदमी दिलासा दे रहे थे। बाद में हमें पता चला कि वो हमारे पिता महाराज थे। मां साहेब को पता नहीं क्या हो गया था कि वो चीख रही थी चिल्ला रही थी। पिता महाराज उनकी बिगड़ती हालत देख कर घबरा गए और उसी डॉक्टर की बुलाने भेजा । जब डॉक्टर ने मां साहेब की जांच की तो वो भी बहुत ज्यादा घबरा गई और पिता महाराज से बोली 

"इनको तुरंत आप अस्पताल ले जाइए। इनकी हालत गंभीर है , डिलीवरी के समय दो बच्चों के जन्म के बाद से ही इनका ब्लड बंद नहीं हो रहा है। लगता है शरीर के अंदर इन्फेक्शन हो गया है और कोई नस डैमेज हो गई है।"
दादी सा भी तब तक कमरे के अंदर आ गई। और बोली

"बहुरानी को कुछ ना हुआ है , कोई भूत प्रेत का साया हो गया होगा। तू चिंता मत कर। अभी हम किसी ओझा को बुलाते हैं । वो सब ठीक कर देगा।"

"नहीं मां सा, इनकी हालत तो देखिए आप , कितनी तकलीफ से गुजर रही हैं ये । हमें इन्हें अस्पताल लेकर ही जाना होगा और वो भी जल्दी से जल्दी। हमने ध्यानसिंह को कह दिया है गाड़ी निकालने के लिए। "पिता महाराज बहुत घबराए हुए थे।

"बावला हो गया है के? अपने खानदान की इज्जत का उघड़ा हुआ बदन बाहर के लोग देखेंगे तो हमारे खानदान की नाक ना कट जावेगी। कुछ सोच समझकर बोला कर। हमारे खानदान की इज्जत अंग्रेजों के जमाने से है।तेरे पिता महाराज एक नामी जागीरदार थे। अब भले ही हमारे पास कुछ भी ना बचा हो लेकिन खानदान की इज्जत तो है ना। हमारे घर की औरतों को आज तक किसी ने हवेली के बाहर नहीं देखा । जा अब ज्यादा बात मत कर , हरिया से कहकर तालाब के पास वाले उस  ओझा को बुला ला। बहू रानी अस्पताल नहीं जाएगी ये हमारा फैसला है"। दादी सा ने दो टूक शब्दों में कहा।

उधर मां की तकलीफ बढ़ती जा रही थी, हमको और हमारे भाई को भूख लग रही थी। अब वो चिल्ला भी नहीं रही थी, चुपचाप पड़ी हुई हम दोनों को निहार रही थी और  उनकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। पिता महाराज दादी सा की जिद के आगे झुक गए और ओझा को बुलवाने जाने लगे तभी  मां साहेब ने उनके कुर्ते का एक कोना पकड़ लिया, .....
क्रमशः
लेखिका
संगीता शर्मा