गमों के गहरे अंधकार से निकलने
को जिसे प्रकाश समझ लिया
खींचे चले गए जिसकी रोशनी में
उसी ने हाथ जला दिया
अपने अक्ष को ही अक्सर देख डर जाते हैं
आइने में खुद से नजरें नहीं मिला पाते हैं
तेरी रुसवाई पर दिन रात इतना रोएं
अब तो आंखों के आसूं भी सूख गए
कोई तमन्ना दिल में बाकी ना रही
इतना मायूस किया तूने ऐ जिन्दगी
तेरी हसरत अब इस दिल में नहीं
तुझसे तो मौत की बाहें ही सही ।।
नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

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