दोस्तों, जमाने में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिनकी किस्मत में रब ने खुशियों के मोती की जगह कांच के टुकड़े बिखेर दिए हैं, वो चुभते रहते हैं जीवन भर। उन्हीं कांच के टुकड़ों से वो अपने सपनों का महल बनाते हैं । जिसके टूटे हुए नुकीले कोने अक्सर घायल कर देते हैं उसकी अंतरात्मा को।एक आह निकलती है दो बूंद पानी गिरता है होंठों से एक सिसकी निकलती है और फिर ?
और फिर क्या , सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। वही नकली मुस्कुराहट, वही भागम भाग की नीरस जिंदगी उनकी जिंदगी घने कोहरे में छिपी होती है और वो हमेशा इस तलाश में भटकते रहते हैं कि शायद उन्हें भी मिल जाए कहीं से -
"एक टुकड़ा धूप का "
तो दोस्तों आइए हम सब मिलकर ढूंढते हैं शायद हम लोगों में से किसी को मिल जाए और ये कोहरा छंट जाए।
वो भी गुनगुनी धूप में आशा की चादर ओढ़कर बैठ सके।
वक्त की सुई और साहस का धागा लेकर सिल सके अपने जख्मों को। झूठे रिश्तों नातों से फटे हुए विश्वास के दामन में तुरपन कर ले। किसी सहारे की चारपाई में बैठकर सुकून की मूंगफली खा सके। अपने अतीत के आईने में दिख रहे सुंदर चेहरे को निहार सके। उससे खुलकर बातें कर सके उससे उसका हाल चाल पूछ सके। पपड़ी पड़े हुए सूखे होंठों पर जरा सा मुस्कान की वैसलीन लगा सके। खुरदुरे हाथों में सुनहरे पलों की मेंहदी लगा सके।
काश कोई दे एक टुकड़ा धूप का
छंट जाएं मायूसी के काले बादल
आ जाए कहीं से किरण रोशनी की
भर जाए उम्मीदों से किसी का आंचल
दरक उठी हैं जो उसके हृदय की दीवार
जमाने की हथौड़ों से चोट खा खाकर
सीलन से लग गई है जो फफूंद उसमें
थोड़ी धूप मिल जाए तो ले आओ जाकर
निकाल लो आंसुओं को आंखों से उसके और
ठंडे पड़ चुके जज्बातों को धूप दिखा दो कोई
वो तो मौन होकर ही सब कुछ सहती रहेगी
अपनी इंसानियत का वो रूप दिखा दो कोई
घने कोहरे में सड़क पर चलते हुए सृजन की आंखें कोहरे से ढके आसमान में कुछ ढूंढ़ रही थी , शायद धूप का एक छोटा सा टुकड़ा और उस टुकड़े के साथ निकलता उम्मीदों का सूर्य । लेकिन कोहरा अभी भी छाया हुआ था और धूप निकलने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी। वो अपनी डायरी को गुलाबी रंग के गर्म कश्मीरी शॉल में छिपाए हुए इलाहाबाद की सड़कों पर निरुद्देश्य टहल रही थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वो अब क्या करे ,जिसकी डायरी उसके पास है उसे वो कैसे ढूंढे ? कैसे उसे तलाश करे ? कैसे उसकी अमानत उस तक पहुंचाए? सुबह 8बजे ऐसा लग रहा था मानो अभी पांच बजे हों। सड़क पर आवागमन तो शुरू था लेकिन ज्यादा भीड़ आज नहीं दिख रही थी। लोग इस घने कोहरे में बाहर निकलने से अच्छा घर में गर्म रजाई के अंदर घुसकर अपने परिवार वालों के साथ बैठकर साथ साथ टीवी देखना और नए नए पकवानों की फरमाइश करना ज्यादा पसंद करने लगे थे। इसमें कोई रोक टोक भी नहीं थी।कुछ कामकाजी पतियों के तो मजे ही मजे थे क्योंकि भयानक शीत लहर के चलते कुछ विभागों में छुट्टियां हो गई थी। अगर सड़कों पर कोई दिख रहा था तो मुंबई जैसी भेलपुरी ,सेवपुरी, लाई चना पापड़ी के खोंचे वाले, खट खट की आवाज़ करते गरम गरम आलू मटर की चटपटी चाट की महक और स्वाद से मुंह में पानी लाने वाले चाट वाले," ताजी भूनी मूंगफली जायकेदार तीखी चटनी के साथ " की सुर वाली लहरदार आवाज़ लगाते हुए ठेले वाले। कहीं ताजी सब्जी, हरी सब्जी की आवाजें आ रहीं थीं, आलू ले लो, टमाटर ले लो, पालक ले लो , परवल,गाजर मटर बैंगन ,मेथी, मूली चाहे जो सब्जी आपको चाहिए
सब मिलेगी , सब्जी वाले के ठेले पर। बहनों, माताओं दादी नानी जल्दी घर के बाहर निकलो , सब्जियां तुम्हें बुला रही हैं। ऐसी लच्छेदार बातों से ग्राहकों को फुसलाते हुए गली गली में सब्जी वाले देखे जा रहे थे। तो कहीं गर्म गर्म भाप उड़ाती चाय पीने के लिए लोग सड़क किनारे लगी चाय की दुकानों के पास खड़े थे। चाय के साथ गर्म समोसे ठंड से निजात पाने का एक अच्छा साधन था।प्याज की गरमागरम पकौड़िया मिल जाए तो फिर पूछना ही क्या? भीड़ हो जाती थी ऐसी दुकानों पर सुबह सुबह। लेकिन आज थोड़ा सा सन्नाटा पसरा था, इतनी भयानक ठंड में बाहर निकलने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा था। इसलिए चाय पकौड़ी वाले थोड़ा सा मायूस थे।
कोहरा इतना घना था कि 100 मीटर की दूरी के लोग भी मुश्किल से नजर आ रहे थे। सृजन उस ठंड में बाहर निकलने की हिम्मत केवल उस डायरी के मालिक की खोज करने के लिए जुटा पाई। ये डायरी उसे सिस्टर मारिया ने इस विश्वास के साथ दी थी कि वो उसे उसके असली हकदार तक जरूर पहुंचा देगी। सिस्टर मारिया अहमदाबाद में एक अनाथाश्रम में रहकर उसका संचालन करती थी और अनाथ बच्चों के साथ साथ बेबस लाचार परित्यक्त , विधवा महिलाओं को भी अपने आश्रम में स्थान देती थी। उन बेसहारा बच्चों और महिलाओं का कष्ट उनके हृदय को पीड़ा पहुंचाता था । उनकी आंखें हमेशा गीली रहती थी। हाथ में पकड़ी हुई माला वो हमेशा फेरती रहती उनके गले में लटका हुआ पवित्र क्रॉस का स्पर्श वो अक्सर करती रहती अपने लिए कभी नहीं, हमेशा उन सबके लिए जो उनके आश्रम में शरण पाकर आई हैं। अपनों के द्वारा दिए गए दुख को भूलकर सबके दुखों में शरीक होने ,अपने बच्चों की छवि उन अनाथ बच्चों के भोले चेहरे में तलाशती हुई। वो ईश्वर से हमेशा यही प्रार्थना करती कि वो उन दुखियारियों के दुखों का निवारण करे। उन्हें अपनी दया का पात्र बनाए इस दुनिया की दया दृष्टि पर जिंदा न रखे सृजन वहीं अहमदाबाद के गर्ल्स हॉस्टल में रहकर जॉब के साथ साथ पढ़ाई भी कर रही थी । वो अक्सर अपनी दोस्तों के साथ सिस्टर मारिया के आश्रम में जाती रहती थी। उसे उन आश्रम में रह रहे बच्चों और औरतों से लगाव हो गया था , अक्सर वो सिस्टर मारिया से कहकर उन औरतों, बच्चों द्वारा बनाए गए सामानों की प्रदर्शनी लगवा देती जिससे उन लोगों की कुछ अतिरिक्त आमदनी भी हो जाती।
उस दिन सृजन फिर आश्रम ही गई थी वो बच्चों के साथ फुटबाल खेल रही थी कि तभी सिस्टर मारिया ने उसे अपने कमरे में बुलाया और कहा.....
सृजन कौन थी?
सिस्टर मारिया ने उससे क्या कहा?
कौन है वो जिसे अपनी जिंदगी में एक टुकड़ा धूप चाहिए?
आइए जानते हैं अगले भाग में तब तक आप पढ़ते रहिए
एक टुकड़ा धूप का
लेखिका
संगीता शर्मा" प्रिया"

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