अल्प ज्ञान से  है खतरा होता,
यह नीम हकीम  खतरे जान।

अधजल गगरी छलकत जाए,
पूरी राह में पानी रहत गिराए।

ये छुद्र नदी जल भर उतराए।
कल कल करती शोर मचाए।

अगर ये अंधे हाथ लगी बटेर,
यह जानो वो बन बैठेगा शेर।

जीवन में बनें नहीं कूप मंडूप,
पढ़े किताबें भरें ज्ञान सन्दूख।

संभव ना 1म्यान में 2तलवार,
सिकंदर से पोरष गए थे हार।

पाप बड़ेरी पे चढ़कर बोलता,
ज्ञानी बोलने से पूर्व  तोलता।

सिर मुड़ाते ही ओले पड़े कहें,
दुःख कोई  दिल में नहीं रखें।

गरीबी में आटा गीला है होता,
दुनिया की है रीति ऐसे होता।

नींद लगी घोड़ा बेंच के सोता,
फ्री में खा खा के मोटा होता।

एक उठल्लू का चूल्हा होताहै,
कभी इधर कभी उधर होताहै।

मर्दों की होती है  एक जुबान,
कभी न बदले भले है जुखाम।

यह आया ऊंट पहाड़ के नीचे,
डर के मारे बार-2 आँखें मीचे।

हाथी चले मस्त ये अपनी चाल,
कुत्ते भौंकने से बदले ना चाल।

आनंद हो अपने में मस्त रहना,
दुनिया क्या कहती क्या करना।


रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.