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'राघव क्या तुम आज भी इंटरव्यू देने नहीं जाओगे"
मां ने कुछ कड़े स्वर में पूछा अगर घर ही बैठना था तो इंजीनियरिंग करने में इतना पैसा क्यों बर्बाद किया।
जितना पैसा पढ़ाई में गया उससे तो दुकान खोल लेते कम से कम आय का जरिया तो बनता।
राघव ने झुंझला कर कहा आप भी मां 'क्या पूरे दिन पीछे पड़ी रहती हो नौकरी करो नौकरी करो जब मरना ही है सब कुछ करके तो क्यों कुछ किया जाए"
''हां हां क्यों नहीं मरना बहुत सरल है ना तो सभी मर जाते आलसी बना रहना है कुछ करना ना पड़े बैठे-बैठे सब मिल रहा है ना मां बाप की मेहनत का ज्ञान बघार लो"
हो गई शुरू मां की किट किट और राघव पैर पटकता घर से चला गया।
दादी चुपचाप देख रही थी और सोच रही थी सारी सुविधाएं देकर हमने आज के बच्चों को खुद ही आलसी बनाया है और अब अपनी गलती का भुगतान भुगतते समय हम भूल जाते हैं कि जब हमने बच्चों को परिश्रम और कठिनाई का पाठ पढ़ाया ही नहीं बस उन पर अपनी इच्छाएं थोप दी तो कैसे हम उनसे मेहनत और जिम्मेदारी की उम्मीद रख सकते हैं।
स्वरचित मौलिक प्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

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