होकर कल्पनाओं के रथ पर सवार,
नीले अम्बर और बादलों के पार,
ख्वाबों में संजोया इक़ ऐसा जहां,
होगा जहाँ मेरे सपनों का संसार।
सागर की लहरें चाँद को चूमती हो,
सुगन्धित बयार गीत गुनगुनाती हो,
क्षितिज में धरा नभ का आलिंगन करती हो,
प्रेम और स्नेह की नदी जहाँ बहती हो।
मिट जायें झूठ,द्वेष,छल-कपट की दीवारें,
प्रेम,विश्वास, दया की चमकती हो मीनारें,
प्रीत मकरंद पान कर मन भंवरा गुंजारें,
नामोनिशान न हो पतझड़ का आएं सिर्फ बहारें।
नवोदित सूर्य रश्मियां धरा पर हरीतिमा लाती हो,
धरती भी अम्बर से मिलकर इठलाती हो,
हरियाली की चादर ओढ़ कर शरमाती हो,
पुष्प लताओं से सजी धरा दुल्हन सी लगती हो।
चम्पा सा श्वेत सवेरा सिंदूरी साँझ हो,
बैर भाव न हो कोई भाईचारे का पैगाम हो,
भावनाओं की डोरी में रिश्ते बंधे हो,
पा लूं पर क्षितिज का ऐसी मेरी उड़ान हो।
वो मेरी कल्पनाओं का रथ चले अविराम हो।
स्वरचित एवं मौलिक
शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"

0 टिप्पणियाँ