संसार के समक्ष ढोंग कर लेना बहुत आसान काम है। अधिकांश मनुष्य जो देखते हैं, उसी को सच समझते हैं। यथार्थ में मन को जीतना बहुत कठिन होता है। मन को जीतना ही यथार्थ सन्यास है।
एकांत के क्षणों में सन्यासी को भी उसका भूत याद आता है। फिर वह भी विचलित होता है।
स्वामी नित्यानंद आज ज्यादा ही बैचेन हो गये। विचारों के प्रवाह में प्रेम तत्व की समीक्षा कर रहे थे। आखिर वह प्रेम है क्या जिसकी अवहेलना भक्त और संत भी नहीं कर पाते हैं। प्रेम ही संसार में मनुष्य को सफल बनाता है। प्रेम ही साधक को साधना की ऊंचाइयों तक पहुंचाता है। वह प्रेम ही तो है जो भक्त को उसके भगवान से मिला देता है।
प्रेम कोई गुदगुदा बिस्तर नहीं है। यह कंटकों भरा बिछोना है। कर्तव्यों का दुर्गम पथ है। त्याग का भी बृहत रूप है।
नित्यानंद याद कर रहे थे उन दिनों को जबकि उनका नाम सोहन हुआ करता था। याद कर रहे थे एक स्त्री को, जिसका सहारा उन्हें बनना था। पर बन न सके। बड़ी बड़ी बातें करना बहुत आसान है। पर उन्हें निभा पाना उतना ही कठिन। दूसरों को उपदेश देना बहुत सरल है। उन्हें खुद अपनाना कभी आसान नहीं होता है। समाज सुधारक का ढोंग करना बहुत आसान है। पर जब खुद के सामने समाज के लिये आदर्श प्रस्तुत करने का समय आता है, उस समय अधिकांश अपने स्वार्थ में उसे भूल जाते हैं। उनका अहम उन्हें झुकने नहीं देता है। खुद को विलक्षण समझने बाले अक्सर प्रेम के नाम का फायदा उठाते हैं। पर क्या जिसे वह प्रेम समझते हैं, वह प्रेम है। जैसे अनेकों समाज सुधारक वास्तव में धोखेबाज होते हैं। उसी तरह प्रेम में भी धोखा मिल जाता है।
कहने को तो लाख बहाने होते हैं। भाभी माॅ के समान होती है। मेरे मन में हमेशा यही भाव थे। निश्चित ही मैं विधवा विवाह के पक्ष में हूं। विधवा विवाह के विषय में सभी को जगाता भी हूं। पर इस समय यह संभव नहीं है। मेरी कोशिश रहेगी कि भाभी के लिये कोई उचित वर तलाश पाऊं।
पर यथार्थ कुछ अलग था। जिस समय पिता जी विधवा भाभी से विवाह कर उसका सहारा बनने को बोल रहे थे, सोहन के मन में सरस्वती की सुंदरता सर चढ रही थी। ऐसी सुंदर कन्या के समक्ष उसे कोई समझ नहीं आ रहा था। निश्चित ही भाभी को सहारे की आवश्यकता है। पर वह सहारा वह तो नहीं हो सकता है। उसका जीवन तो सरस्वती के बिना अधूरा होता है। सरस्वती तो उसका प्राण है।
विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करने का क्या यह आशय है कि खुद के प्रेम को ही भूल जाऊं। यह तो वही बात हुई कि जो बोले, वही कुंडी खोले। शायद इसी कारण से युवा अपनी सोच को जाहिर नहीं करते हैं। शायद इसी कारण से समाज में बुराइयाँ बनी रहती हैं। शायद यही कारण है कि मनुष्य परिवर्तन का प्रयास नहीं करता है। किसी के जीवन का सहारा बनना अधिक जरूरी है अथवा अपना खुद का जीवन तलाश करना।
सत्य भले ही मन में रहे पर पता नहीं स्त्रियां कैसे सत्य जान लेती हैं। सोहन को वह दिन याद आ रहा था जबकि उसी की भाभी ने परिवार में सत्य बता दिया। बता दिया कि वह इतनी निराश्रित नहीं है कि अपने देवर के जीवन से उसका प्रेम ही छीन लें। वास्तव में स्त्रियां कभी निराश्रित नहीं होती हैं। फिर जब सर पर पूज्य ससुर जी और पूज्या सासू माॅ का स्नेह हस्त हो, उस समय तो कभी भी नहीं।
सोहन के प्रेम की राह खुल गयी। दोनों परिवारों में परस्पर वार्तालाप से उसका विवाह सरस्वती के साथ तय हो गया। उसके और सरस्वती के मिलन पर किसी की कोई पाबंदी नहीं थी। प्रेम के वे क्षण हसी खुशी बीत रहे थे। सोहन हमेशा अपनी प्रियतमा के मन की इच्छा पूरी करने की कोशिश करता। शायद यह उसका भ्रम था। भला क्या कोई किसी के मन की थाह पा सकता है। भला उपहारों से किसी का प्रेम खरीदा जा सकता है। प्रेम तो अमूल्य होता है। प्रेम को खरीदना और बेचना भला कब संभव है।प्रेम की बिक्री यही सिद्ध करती है कि वास्तव में प्रेम है ही नहीं।
एक दिन सारे समीकरण बदल गये। जिस पर सोहन को ज्यादा विश्वास था, उसी ने उसका विश्वास तोड़ दिया। सरस्वती ने सोहन का प्रेम ठुकरा दिया। साथ ही अपना लिया, उसी के तएरे भाई प्रेम को।
सोहन धोखे को भुला न पाया। अपना मानसिक संतुलन खो बैठा। शायद यह बेटे के प्रति प्रेम ही था कि कभी भी अपने बड़े भाई के समक्ष सर न उठाने बाले उसके पिता का उसके ताऊ से विवाद हुआ।
यादों की कस्ती में सोहन उस दिन को देख रहा था जबकि वह पूरे संसार को धोखे का पर्यायवाची मान संसार से भाग रहा था। पर क्या यह सत्य है। क्या संसार केवल धोखा ही है। नहीं.. ।यह सत्य तो नहीं लगता। यदि संसार केवल धोखा होता तो खुद भगवान ही क्यों संसार में आते।
लगता है कि सभी के संसार में आने का कोई खास उद्देश्य होता है। स्वामी नित्यानंद उर्फ सोहन को अभी भी अपने जीवन का उद्देश्य समझ नहीं आ रहा। फिर भी वह अपने पूर्व जीवन की तरफ जा रहा है। इसी उम्मीद के साथ कि शायद उसे अपने जीवन का उद्देश्य मिल जाये।
अपने उद्देश्यों के मार्ग पर चलता हुआ मनुष्य अपने जीवन ही नहीं अपितु आध्यात्मिक मार्ग के परम लक्ष्य को भी प्राप्त कर लेता है। पर उद्देश्य की सही पहचान आसान नहीं होती। यदि इसी को समझ लेना इतना आसान होता तो जीवन में भ्रम की स्थिति क्यों आती। बार बार मन का निश्चय क्यों टूटता। यदि उद्देश्यों को पहचान लेना ही आसान होता तो भला पतन की स्थिति कैसे आती है। अनेकों बार मानवता में ह्रास यही सिद्ध करता है कि जीवन के उद्देश्य की पहचान ही सबसे कठिन होती है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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