दर्द सीने में जो मेरे छुपाये बैठे हैं।
किससे बांटूं कोई अपना नहीं मेरा।।

किसी से कह भी दूँ तो क्या होगा।
कम नहीं होगा वे लोग हँसेगें केवल।।

उदास रहने काभी न फायदा कोई।
दुःख दर्द बाँटने न कोई आता कभी।।

दर्द अपनों से ही हमेशा है ये मिला।
वोतो अपने हैं करूँ उनसे क्या गिला।।

दर्द का हाल न पूछो दिल जख्मी है।
खुद ही मरहम लगाये बैठे हैं जख्मी।।

लाख कोशिश भी की दिल ना टूटे।
ये न संभव हुआ लोग अपने ही लूटे।।

ये टूटे दिल को फिर से चाहा जोड़ें।
धोखे की सूरत दिखते ही मुँह मोड़े।।
 
हर जख्म के दर्द को सहा हूँ हँस के।
रोके देखेहैं बहुत कुछ न मिला रोके।।

हमने दी थी जिन्हें ये खुशियां सारी।
उन्हीं लोगों ने ही मेरी खुशियां मारी।।

जी लिया है बहुत कितना जीना है।
दर्द ही तकदीर में लिखा तो जीना है।।

मेरा ये दर्द भी दर्द अब नहीं लगता।
क्यों कहूँ किसी से कोई क्या लगता।।

दर्द कितना भी हो मुस्कुराना सीखो।
सांस जैसे भी यह चले जीना सीखो।।

रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश