माधव ने मानवेंद्र को कुछ कहने से रोक दिया और उस आदमी की ओर देखा और कहा
"देखो, अभी इन्होंने भोजन नहीं किया है तुम गांव चलो, हम लोग अभी गांव आकर सारा मामला समझते हैं"।साथ ही उसने उस आदमी की तरफ यूं गुस्से से देखकर जाने का इशारा किया कि वो सहम गया।और मानवेंद्र को सिर झुकाते हुए बोला
"मन्ने माफ कर दो कुंवर सा, ,यह आपके भोजन का समय है, मन्ने पता न था। आप थोड़ी देर बाद आइए । तब तक मैं खेतों पर चला जाता हूं। ढोर डंगरो के लिए कुछ चारे का भी बंदोबस्त भी करना है मन्ने । चलता हूं कुंवर सा। घणी खम्मा ।"
"अच्छा ठीक है, तुम चलो मैं अभी आता हूं" ।मानवेंद्र ने उस आदमी को गांव जाने के लिए कहा ।
माधव और मानवेंद्र ने भोजन कर लिया और फिर दादी सा और संयोगिता को अपने कमरे में बुलाया जब सब लोग आ गए तो मानवेंद्र ने माधव के पास बैठकर रूंधे गले से कहा।
"माधव भैया... आपने उस समय कहा था कि आप संयोगिता को अपना जीवनसाथी बनाना चाहते हैं। हम कैसे इस बात को मान लें। कहीं आप मेरी दीदी की सुंदरता से क्षणिक प्रभावित होकर तो ऐसा नहीं कह रहे हैं , देखिए भैया, हमारी दीदी बहुत ही अच्छी हैं। अगर बाद में उनकी आंख से एक भी आंसू आया तो हमसे बिलकुल भी सहन नहीं होगा। हम मानते हैं कि आप इतने बड़े जागीरदार है, आज भी आपकी हवेली में दरवाजे पर हाथी और घोड़े रहते हैं। आजादी के इतने वर्षों बाद भी आपके ठाठ बरकरार है । नौकरों की पूरी फ़ौज है। पूरे राजस्थान में भी आपके जैसा कोई राजपूत खानदान रईस नही है। कहां आप और कहां हम। हम तो हैसियत मेंआपके सामने कुछ भी नहीं है। लेकिन हमारी बहन की भावनाओं से बढ़कर हमारे लिए कुछ भी नहीं है।आपके साथ हम अपनी बहन का रिश्ता जोड़ने से पहले आपको हमें विश्वास दिलाना पड़ेगा कि आप हमारी बहन को कभी कोई कष्ट नहीं देंगे।"
"मनु, तुम कैसी बातें कर रहे हो? मैं संयोगिता को अपने हृदय में छुपाकर रखूंगा । ये एक राजपूत का वचन है मैं कभी उसकी आंखों में आंसू नहीं आने दूंगा। उसके अलावा किसी और स्त्री के बारे में सोचूंगा भी नहीं। मेरी प्रथम तो नहीं लेकिन अंतिम स्त्री जरूर संयोगिता ही है।
मनु, संयोगिता मेरा जीवन है। उसके बिना मैं कुछ भी नहीं।"
संयोगिता ने चौंक कर अपना सिर उठाया।और माधव की ओर देखने लगी। माधव वैसे तो सुदर्शन व्यक्तित्व का मालिक था। परंतु उसके आचरण के विषय में उसे शंका थी। लेकिन उसकी बातें सुनकर संयोगिता को ऐसा लगा मानो उसने माधव के विषय में गलत धारणा बना ली थी।माधव इतना भी बुरा नहीं है जितना उसने सोच लिया था।
और दूसरी बात कहीं न कहीं उसका विवाह तो होना ही है, क्या पता भगवान जी ने उसकी किस्मत में माधव का ही साथ लिखा हो। संयोगिता ने मानवेंद्र की तरफ देखा जो पशोपेश में पड़ा हुआ था। संयोगिता ने सब कुछ अपने भाई और दादी सा के ऊपर छोड़ दिया ,वो जिसके साथ उसका विवाह तय कर देंगे वो आंख मूंदकर उस व्यक्ति के साथ चली जायेगी।
मानवेंद्र ने एक नजर संयोगिता की ओर देखा और उससे पूछा
"दीदी, मैं आपका विवाह माधव के साथ निश्चित करने जा रहा हूं। दादी सा ने पहले ही अपनी सहमति दे दी है। माधव भैया की इच्छा और संकल्प आप जान ही चुकी हैं।अब आपकी इच्छा क्या है यह आप बता दें। क्या आप माधव सिंह जी के साथ विवाह करने के लिए इच्छुक हैं या नहीं।"
संयोगिता ने अपने भाई को नजर उठाकर देखा जो था तो उससे दो मिनट छोटा, लेकिन उससे कहीं अधिक परिपक्व लग रहा था। उसने दादी सा और मनु से कहा
"मनु, दादी सा, आप जहां भी , जिसके साथ भी हमारा विवाह निश्चित कर देंगे मैं कर लेंगे। आपको हमारे लिए जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार है।"
मानवेंद्र की आंखों में आंसू भर आए थे।वो भले ही दो मिनट छोटा था संयोगिता से लेकिन संयोगिता और वो, दोनों नौ महीने तक साथ साथ मां के गर्भ में थे। दोनों के दुख दर्द, खुशियां सब एक जैसी थी दोनों मातृ विहीन थे।
दोनों ने ही जन्म लेते ही अपनी मां को खो दिया था। उसने तो दादी सा का प्यार पाया लेकिन संयोगिता की परवरिश तो नौकरानियों के भरोसे हुई। अगर माला दीदी नहीं होती तो उसकी हैसियत एक नौकरानी से अधिक नहीं होती।और आज भी उसकी दीदी ने अपने जीवन के सबसे अमूल्य फैसले का अधिकार भी उसे ही सौंप दिया है।
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कैद सा एक बंधन कोई बांधने चला है
अपने साथ खींचकर वो ले जाने चला है
पता नहीं रूह जख्मी होगी या उसका शरीर
जहरीले तीर जुल्मों के वो बनाने चला है
वो दिखता है जैसा , वैसा बिलकुल नहीं है
फिर भी चोला शराफत का दिखाने चला है
शायद मेरी लिखी हुई ये पंक्तियां केवल पंक्तियां नहीं है संयोगिता के जीवन का सच है। अफसोस इस बात का है कि संयोगिता भी इस सच को स्वीकार कर लेती है। क्योंकि वह भी माधव की असलियत समझ नहीं पाती और अपने भाई और दादी सा की तरह उसे भी माधव पर पूरा विश्वास हो जाता है। भाई जिसने उसके सिर पर हाथ रख कर कहा था कि मैं आपकी इच्छा के खिलाफ कुछ नहीं करूंगा। वही उसका हाथ माधव को पकड़ा देता है। माधव ने दादी सा के साथ साथ मानवेंद्र को भी अपने शीशे में उतार लिया था।और संयोगिता के साथ उसका विवाह निश्चित हो जाता है। मानवेंद्र इस खुशी में पूरे गांव में मिठाई बंटवाने के लिए जाता है। वहां सब उसका इंतजार कर रहे थे। ताकि वो उस औरत के अपराधी के विषय में कोई निर्णय ले सकें। लेकिन जब मानवेंद्र मिठाई के टोकरों के साथ गांव पहुंचता है तो सब लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं। मानवेंद्र उन्हें जब बताता है कि उनकी बहन संयोगिता का विवाह निश्चित हो गया है तो सब खुशी से झूम उठते हैं। लेकिन जब मानवेंद्र यह बताते हैं कि संयोगिता का विवाह किसके साथ तय हुआ है तो सब लोग उस औरत की तरफ देखने लगते हैं
क्या होगा आगे?
आइए जानते हैं अगले भाग में तब तक आप ढूंढते रहिए
"एक टुकड़ा धूप का"
लेखिका
संगीता शर्मा

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