बेटी नहीं कोई सामान जो दान दीजिए
बेटी को बहू बनाने न कन्यादान दीजिए 

है वो भी इंसान बात इतनी समझ लीजिए
करो उसकी इच्छाओं का भी सम्मान ठान लीजिए

न होगी बेटी तो संसार आगे बढ़ नहीं पाएगा
बहू और बेटियां खुद के आंगन में  सज़ा लीजिए

पढ़ लिख कर ख़ुद की पहचान उसको उपहार दीजिए
ना हो मोहताज चाहे हो अपना परिवार ध्यान दीजिए 

माता पिता को अब सुधारना अपना काम चाहिए 
बेटा बेटी एक समान तो क्यू किसी से झुक कर रहिए



© रेणु सिंह " राधे " ✍️
कोटा राजस्थान