फिर आ गई सर्दी की वो रात
ठंडी हवा किट किट बजते दांत
सुनहरी धुप तन मन को भाय
देती गर्माहट अदरक वाली चाय
पहाड़ बर्फ की सफेद चादर ओढ़े
छाया काला घना कोहरा कही पे
हर तरफ सड़कों पर सन्नाटा पसरा
कोई बाशिन्दा ना घर से निकला
अपनी अपनी रजाइयों में दुबके
कोई अलाव जलाएं मारे ठंड के
गर्मी का कुछ ना कुछ जुगाड़ बैठाये
सब जतन कर खुद को ठंड से बचायें
सर्दी की उस भयानक रात में
फ़टे पुराने भयावह हालात में
फुटपाथ के एक कोने में दुबक
एक नन्हा जीवन रहा सुबक
ना ऊनी कपड़े ना पास रजाई
ठंडी से बचाने ना आग जलाई
ना घर ना छत ना कोई सहारा
पेट गुड़गुड़ करे भूख का मारा
दिन तो सुरज की गर्मी में काट लिया
आकर रैना ने ठंडी बाहों में जकड़ लिया
दूर तलक कोई रौशनी नजर नहीं आती
जो उस नन्हे परिंदे का जीवन बचा पाती।।
नेहा धामा " विजेता " बागपत ,उत्तर प्रदेश

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