दिल करता है दूं मैं बधाई।
पर आखिर किसे दूं मैं बधाई।
जो दुश्मन की जीत पर जश्न मनाए।
जो अपने देशवासियों का दिल जलाए।
जो धर्म की आड़ में करते दंगे।
जो सच्चाई,ईमान से लेते पंगे।
जो पराई अबला पर डाले निगाहें।
जो स्वार्थ,अधर्म का चुने राहें।
जो एक दूजे को दोषी ठहराते।
जो खुद बुराई से बाज ना आते।
जो तेरा-मेरा की रट लगाते।
जो देश के अमन को अनदेखा करते।
ऐसे में कैसे दूं बधाई।
दिल में दफन है ढ़ेर बधाई।
दिल से निकलने को आतुर है बधाई।
जो देश बचाए उन्हें लाख बधाई।
चेतना सिंह।

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