रग-रग में बसती बेफिक्री,
मस्ती भरी शैतानियां थी।
जहाँ स्वप्नलोक में ले जाती,
दादी-नानी की कहानियां थी।
उन सतरंगी पतंगों संग मन,
अनन्त आकाश में उड़ जाता था।
काटी जाती हर रोज पतंगें,
पर मन में द्वेष न आता था।
वो बचपन के खेल तमाशे,
प्यारी कागज की कश्ती थी।
मिट्टी के बनाते ताजमहल,
मुट्ठी में शोहरत दौलत थी।
निश्छल मन कल्पना अनन्त,
तर्क-वितर्क बहुत से आते थे।
उस छोटे से खुरापाती दिमाग में,
हम काम बड़े कर जाते थे।
प्रतिस्पर्धा न थी मन में,
हम तो बस जश्न मनाते थे।
यारों की टोली साथ हो तो,
हर मुश्किल से लड़ जाते थे।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"

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