बहुत से ऐसे संत भारत में हुए हैं जिन्हें अपने जीवन में आहार की आवश्यकता ही  महसूस नहीं हुई।
आज एक ऐसी महिला की कहानी बताने जा रही हूं ,जिसका उल्लेख परमहंस योगानंद जी  ने अपनी आत्मकथा में किया है।
गिरिबाला
पुरुलिया के बिउर गांव की निराहारी योगिनी का 
योगानंद जी ने  परिचय इस प्रकार दिया था,आध्यात्मिकता की चमकदार साड़ी में लिपटी ,शांत,सरल महिला ,सुडौल नासिका,छोटी तेजस्वी आंखें, बाल सुलभ मुस्कान, वार्धक्य के चिह्न शरीर से दृष्टिगोचर होते हुए,लेकिन काया निराहार होने के बाद भी कृशकाय नहीं।
12 साल चार माह  की उम्र से (जब योगानंद जी मिले थे उस समय गिरिबाला की उम्र 68 साल की थी) करीब 56 सालों उन्होंने  कुछ भी खाया पिया नहीं था।

योगानंद जी ने पूछा _आपको कुछ खाने की इच्छा नहीं होती ?आपका शरीर कैसे जीवित है ?
गिरिबाला ने कहा_अगर मुझे इच्छा होती तो मैं अवश्य खाना खा लेती।
और मेरे शरीर के जीवित रखने के लिए तो आप जानते ही हैं_ "हवा और सूर्य प्रकाश की सूक्ष्म शक्तियों से तथा मेरुशीर्ष के माध्यम से  शरीर को नवशक्ति प्रदान करने वाले महाप्राण से पोषण देती  है।"
वैज्ञानिकों ने भी इस पर शोध किया है।
""क्लीवलैंड के डॉक्टर जॉर्ज .डब्ल्यू क्राइल ने  17मई 1933 को मेमफिस में डॉक्टरों  को एक सभा में संबोधित करते हुए कहा था कि_हम जो कुछ खाते हैं,वह केवल विकिरण है,हमारा आहार ऊर्जा का एक विशिष्ट परिमाण होता है।"

योगानंद जी ने उनसे ,उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में जानना चाहा।
गिरिबाला ने बताना शुरू किया_
नौ वर्ष की उम्र में मेरी सगाई हो गई,मैं बहुत खाना खाती थी इसके लिए मां बहुत डांटती ,कहती तुझे ससुराल में सब बातें सुनाएंगे और तुझे खाने को  कुछ भी नहीं मिलेगा।
जिस बात का मां की डर था वही हुआ।जब मैं नवाबगंज अपने पति के घर रहने गई,तो उस समय मेरी उम्र केवल 12 वर्ष की थी।सतत खाने की आदत के कारण सास सुबह से शाम तक लज्जित करती रहती।
एक दिन सास ने बहुत ही कठोर वचन कह दिए।
मैने भी झल्लाकर कहा _मैं  शीघ्र ही आपको दिखा दूंगी कि जब तक मैं जीवित रहूंगी,तब तक अन्न का स्पर्श नहीं करूंगी।
मेरी सास ने उपहास करते हुए अच्छा! जब तुम अत्यधिक खाए बिना नहीं रह सकती तो बिना खाए कैसे रह सकती हो?

मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं था ,बस मैं अनवरत ईश्वर से प्रार्थना  कर रही थी, कि हे ईश्वर मुझे कोई ऐसा गुरु भेजिए जो मुझे अन्न के बदले आपके प्रकाश से जीवित रहना सिखा दे।
तभी रास्ते में हमारे पुरोहित से मुलाकात हुई,उनसे मैने प्रश्न दुहराया तो उन्होंने बहुत गौर से मेरी ओर देखा ,और फिर कहा शाम को मंदिर में आ जाना मैं तुम्हारे लिए एक विशेष वैदिक अनुष्ठान करूंगा।

मुझे संतुष्टि नहीं हुई,मैं गंगा घाट की ओर चलती गई ,वहां मैं गंगा के जल में ऐसे घुस गई ,जैसे कोई दीक्षा लेने जा रही हूं।
स्नान कर मैं गीले कपड़ों में ही घाट पर निकल आई ,तभी  मैंने देखा घाट पूरी तरह निर्जन हो गया ,एक सौम्य ,मृदु आवाज से गुरुदेव मेरे सामने प्रकट हो गए।
मैं उन्हें देखती रह गई ,उन्होंने कहा मैं ही तुम्हारा गुरु हूं,तुम्हारी व्याकुल प्रार्थना को पूरा करने ईश्वर ने मुझे भेजा है।आज से तुम सूक्ष्म प्रकाश से जीवित रहोगी तुम्हारे शरीर के अणु परमाणु ब्रह्मांड में व्याप्त अनंत प्रवाह से सीधे नवशक्ति प्राप्त करेंगे।

उसके बाद गुरुदेव ने हमारे चारो ओर एक प्रकाश के वलय का निर्माण कर दिया ताकि आने जाने वाले किसी व्यक्ति को हम दिखाई न दें ,और कोई विघ्न न उत्पन्न हो सके।उसके बाद उन्होंने मुझे क्रिया प्रविधि की शिक्षा दी।

कुछ प्रश्न और भी थे ,जिसे जानने की उत्सुकता हर किसी में थी।
जैसे उन्होंने बताया मैं अनेक वर्ष पहले विधवा हो गई थी,मुझे कोई संतान नहीं हुई।
मैं बहुत कम सोती हूं,क्योंकि मेरे लिए सोना ,जागना एक समान है,रात को मैं ध्यान करती हूं,दिन में घर के कामकाज करती हूं।
मैं कभी बीमार नहीं पड़ी,मुझे वातावरण के फर्क का किंचित अनुभव नहीं होता।

मेरे शरीर में मल निस्सारण नहीं होता।

मैं अपने हृदय की धड़कन और श्वास को नियंत्रित कर सकती हूं।

योगानंद जी ने कहा_आप संसार को ये विधा क्यों नही सिखाती ?
उन्होंने कहा _मेरे गुरुदेव ने इसे प्रकट करने को मना किया है, वे ईश्वर की बनाई सृष्टि में दखल देना नही चाहते ।

प्रश्न एक और उभरा_आपको ही अकेले निराहार रहने का सामर्थ्य देने का क्या उपयोग?
गिरिबाला ने जवाब दिया_यह सिद्ध करने के लिए की मनुष्य आत्मा है, दैवी उन्नति द्वारा मनुष्य धीरे धीरे सनातन तेज से जीवित रह सकता है।
योगानंद जी ने अपनी आत्मकथा में उल्लेख किया है कि उनके निराहार होने की जांच उनके पड़ोसी  ने  वर्धमान के राजा से करने का अनुरोध किया था। 

उस समय के वर्धमान के राजा ने उन्हें परीक्षा के लिए आमंत्रित किया था।महल के एक छोटे से  तालाबंद हिस्से में तीन तीन बार कठोर निगरानी की,और अंत में सभी को पूर्ण विश्वास हो चुका था कि वे निराहारी योगिनी है।

साभार_योगी कथामृत