सूरज जगत पिता कहलाते।
सबमे जीवन रहते।।
सदा गतिशील रहते।
सृजन का पाठ पढ़ाते।।
जलचर, थलचर, नभचर
सब पर नेह लुटाते ।
कभी न रूकते कभी न थकते ।।
हर पल चलते रहते।
सुख दुख में सम ही रहना है।।
जीवन का लक्ष्य बताते।
उदय अस्त दोनों में पूजकर सब आशिष पाते।।
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉक्टर आशा श्रीवास्तव जबलपुर

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