अहसास जो मेरे अन्दर है
वह तुम्हारे अन्दर भी,
तुम खामोश रहते हो
और-------------
मैं बोल जाता हूं।
तुम्हारी जीभा से
सरकता शब्द
गुलाबी होंठों पर
अटक जाता है।
और-----------
मेरा शब्द
मेरी आंखों से
तुम्हारी आंखों में चला जाता है
और-----------
तुम नि: शब्द
जैसे----------
तुम्हारा नि: शब्द
नदी सा नयन
कह रहा है-
मेरे दो किनारा
लाज और शालीनता
इसे टुटने मत दो!
और--------
मैं नि: शब्द ।
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नाम- राहुल रंजन
भवानी पुर, प्रतापगंज,
जिला-सुपौल

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