द्वन्द मचा है अंतर्मन
कौन हूं मैं,
क्या है अस्तित्व मेरा
मनुष्य हूं या कोई निर्जीव वस्तु,
चीर रही मेरे वस्त्र आंखें तुम्हारी,
या चीर रही है मेरा अंतर्मन
ये बदछुअन तुम्हारी,
तन बदन को चीर कर क्या पाओगे आखिर,
तुम्हारी तरह मैं भी एक इंसान हूं
अपने पौरुष बल आखिर
किस बल पर आजमाते हो,
हूं मैं किसी की माँ और बेटी
हर उम्र को तुम रौंद जाते हो
अंतर्मन मेरा चीर कर
ज़िंदा लाश बना दिया
एक शरीर को रौंद कर
आखिर क्या तुमने पा लिया
जिस्म का कतरा कतरा तुमने
भूखे भेड़ियों सा नोच लिया
द्वन्द मचा अंतर्मन
कौन हूं मैं
जी रही हूं या बन चुकी हूं लाश मैं
मौत भी मुझे यूँ देखकर
आज विचलित हो गयी,
मौत भी मुझको क्या मारेगी
जो रूह मेरी निचौड़ी गयी
क्या होगा इन जलती मोमबत्तियों से
एक वक़्त इन्हे बुझ ही जाना है,
ये श्रद्धा रुपी पुष्प चढ़े इनको भी मुरझा जाना,
पर ये आज बताते जाना,
मुझको ये समझाते जाना
कब होगा इंसाफ, कब न्याय का होगा पक्ष,
कब तक़ इन दरिंदो को
हमें यूँ ही झेलना होगा
कब इन हैवानों को
भी मेरा दर्द महसूस होगा,
कब तक़...... आखिर कब तक़
बस अब और नहीं सहन होगा
धरती माँ भी करे पुकार
इन पापियों का बोझ भी
अब मुझसे ना सहन होगा
बस और नहीं.....
निकेता पाहुजा
रुद्रपुर उत्तराखंड

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