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चाँद को लगे काले टीके जैसा,
या यूँ कहूँ के ढलते सूरज की अंगडाई जैसा, 
सर्द हवा मे निकली धूप के जैसा, 
कभी चिलचिलाती गर्मी मे नीम की छावं जैसा, 
उसकी आँखों का काजल कुछ ऐसा है 
मेरे अंतर्मन पर फैले उजियारे जैसा है। 

कभी कटार की सीधी मार है, 
कभी मीठी छुरी सी धार है, 
कभी ठक से लगी कोई गोली जैसा, 
कभी सुदूर छोड़ी मिसाइल जैसा, 
उसकी आँखों का काजल कुछ ऐसा है, 
झुकी पलको से घायल कर दे वैसा है। 

नज़ाकत,शोखियों,अदाओं से भरा, 
मासूमियत से भरे शबाब जैसा, 
इश्क़ को मुक्कमल मोहोब्बत जो कर दे, 
पूर्णिमा की रात के आफताब जैसा, 
उसकी आंखों का काजल कुछ ऐसा है, 
धड़कनो को काबू कर ले वैसा है।।
🎄🎄स्वरचित🌹🌹🌹
प्रितम वर्मा🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼