वो यादें बिसरी याद आती है
वो बचपन की बातें याद आती है
याद आते है बचपन के चवन्नी वाले दिन
वो इमली की चटनी,
वो इमली वाले राम लड्डू
याद आती है वो सुनहरी यादें
वो किराये की साईकिल
वो चूल्हे की रोटी
वो मिट्टी के आंगन
याद आते है वो भूले बिसरे बचपन के दिन
वो बारिश में कागज की कश्ती
वो पनघट पर लगती घडो की गिनती
वो पेड़ो पर लटकते रस्सी के झूले
बताओ हम कैसे वो दिन भूले
वो स्कूल का झोला
टिफिन में अचार की खुशबू
वो चम्पक, चाचा चौधरी और साबू
याद आते है वो टैस्ट के लिए बीच के पन्नो वाले दिन
बहुत याद आते है वो ग्रीटिंग कार्ड वाले दिन
वो खेत के गन्ने, वो कोल्हू का गुड़
वो पड़ोस के बच्चों के संग छुपन छुपाई वाले दिन
वो माँ की मार के डर से पड़ोस के घर में छुप जाना
याद आते है वो चित्रहार, रंगोली वाले दिन
वो इतवार को रामायण, महाभारत की गरजना
वो पूरे हफ्ते फीचर फ़िल्म का इंतजार करना
याद आते है वो एंटीने वाले दिन,
वो स्टापू, कंचे वाले दिन
वो गिट्टे, और लंगड़ी टांग वाले दिन...
बहुत याद आते वो भूले बिसरे बचपन के दिन...

निकेता पाहुजा ✍️
रुद्रपुर उत्तराखंड