एक ठिठुरती सर्द शाम की
अनोखी है ये दास्तान
जिसमें कुछ अनमोल यादों की
सरगोशियां शामिल हैं बेहिसाब
जब लोग दुबके रहते हैं रजाइयों में और 
मां के नुस्खे काम आते हैं हल्दी दूध के प्याले में।।


कोई तुम्हें देखता होगा जी भरकर
पर अफसोस,ये कब जान पाओगे तुम
इन खामोशी सी सर्द रातों की बेचैनी
 कब समझ पाओगे तुम।।

मौसम कितना भीगा सा  सुहाना सा है,
इस सर्द की रात में
बारिश की बूंदों ने
मन के सारे घावों पर 
मरहम लगा सा दिया है।।

सभी मौसम होते हैं खास
ठण्ड की हैं कुछ अलग ही बात,
गरम गरम चाय और पकौड़े हो साथ
कप कप करके ठंडी बजती
ओस की बुँदे घास पर सजती
कोहरा सजता हैं बड़ा दमदार
पहाड़ों पर सजता ये सदाबहार।।

दिन कब ढल जाये पता ना चले
रात की गहराई में हम आसमां तले
इक्कट्ठी करके ढेर सारी लकड़ी
आग जला कर सब अन्ताक्षरी खेले
हर साल बीते ऐसी ही सर्द की छुट्टियाँ
जब मिल बैठे भाई बहन और सखा सखियाँ।।

ठण्ड में साँसों से हैं धुँआ निकलता
भीनी भीनी धुप में जन्मो का सुख हैं मिलता
चाय का प्याला भी खूब अपना सा लगता
आग की गर्मी में ही मौसम  है जचता ।।

कोई चिथड़े में लिपटा ,कोई घर में है सिमटा 
कोई कोट पैंट में भी आके, बनता नवाब नहीं
रंग बिरंगे कपड़ों में बच्चे ,आँगन में खेले लगते अच्छे 
दादा -दादी के पहरे का कोई हिसाब नहीं।।