पहले हर घर मे एक आंगन होता, उस आंगन मे एक पेड़,
माँ उसे सजाती सबके लिए,
बुढ़ापे में उसी आंगन मे खुद लेटती,
न जाने क्या पेड़ से बातें करतीं,
सुबह चिंडियो की आवाज, आंगन में लगे फूलों की खुशबू,
रात मे चांद झूमर से कम न दिखता,
नीचे जलता हुआ दिया अपनी ओर खिंचता
जब आते घर मे मेहमान आंगन मे सब होते साथ,
होती हंसी ठीठोली, प्यार की महफ़िल जमती,
आंगन के बीचों बीच तुलसी का पौधा होता,
जिसे सारे बच्चे गोल गोल घुमा करते,
ठंड मे सब औरतें बैठ कर धुप लेती,
घंटो बैठ कर बातें करती,
रहता हर पल खुशियों से महकता आंगनl

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