अग्नि साक्षी होती जहाँ .. 
मिलते दो पथिक अनजानी राहों से.. 
कर में होती वरमाला 
स्विकृत हो प्रणय निगाहों से.. 

आवेशित मन के संवेगों का
होता कुछ ऐसा प्रभाव.. 
एक रथ के दो पहिये में
होने लगता जब दुर्भाव .. 

कर्तव्य- अधिकार के समर में 
भावनाएं होती निस्तेज.. 
विकट फैसला होता फिर.. 
हो जाता संबंध विच्छेद.. 

दिल के टूकड़े होते हैं.. 
पतझड़ सा होता है जीवन.. 
कराहती मंजिल होती.. 
जब बिखरे होते बागवान.. 

एक जीत की चाहत में
संत्रास अनेकों होते हैं
अपने उर के अंश कभी 
अपनों के लिए तरसते हैं

बंटते है अधिकार जहाँ
प्रतिद्वंद्वी सम हालत होती
संतति के पालनहारों की 
नहीं सर्वसम्मति होती.. 

पिसते रहते पाल्य जहाँ
दंपत्ति के इस घनचक्कर में
मात पिता में किसको त्यागे
चक्र ब्यूह जैसे रण में.. 

जीवन के उथल पुथल में भी
जी भर के जीना होता है.. 
शहद मिले या नीम मिले
हंस हंस कर पीना होता है..!