जब मनुष्य के पास पैसा आता है तब वह अक्सर अपना अतीत भी भूल जाता है। फिर रिश्तों और मित्रों की भी परवाह नहीं करता है। विपत्ति में उसके संगी रहे अपनों को अपना कहने में भी शर्मिंदगी महसूस करता है। वैसे भी रिश्तेदारी हो या मित्रता, हमेशा समकक्ष से ही करनी चाहिये। फिर समय के साथ समकक्ष की परिभाषा भी बदल जाती है। हालांकि वह भूल जाता है कि जिनकी वह अवहेलना कर रहा है, वही उसकी वर्तमान सफलता के लिये उत्तरदायी हैं। यदि आज वह बुलंदियों के आसमान पर खड़ा है तो इसमें उसके परिश्रम के अतिरिक्त भी कुछ अन्य के त्याग का योगदान रहा है। 

  गांव में एक टूटा फूटा मकान। हालांकि मकान में अनेकों कमरे बने हुए हैं। जो उसके गौरवशाली इतिहास का प्रतीक हैं। पर आज प्रयोग लायक मात्र दो ही कमरे हैं। हालांकि इस जीर्ण शीर्ण मकान की दशा सुधारी जा सकती है। पर एक तो सुधारने के लिये धन की आवश्यकता होती है। दूसरा कि अब यहाॅ रहता ही कौन है। मात्र दो प्राणी जो अपने जीवन के अवसान की राह देख रहे हैं। 

   ठाकुर नरेश सिंह इस घर के मुखिया हैं। उम्र के लगभग सत्तर बसंत देख चुके हैं। हालांकि अपनी आयु की तुलना में अधिक स्वस्थ प्रतीत होते हैं। संभवतः गांव के प्राकृतिक माहौल में रहते आये तथा जवानी का अच्छा खानपान, उचित शारीरिक मेहनत ही उनकी स्वस्थता का कारण है। शहरों में तो इस आयु से बहुत पहले ही लोग दवाओं के बलबूते जीने के आदी हो जाते हैं। इस आयु तक ज्यादातर बिस्तर पकड़ लेते हैं। पर ठाकुर साहब इस आयु में भी दो किलोमीटर दूरी तक टहल कर आते हैं। लगता है कि बालों को चांदी करने के बाद बुढापे को भी उनके शरीर में दूसरा हिस्सा नही दिखा जहाॅ वह अपना प्रभाव जमा सके। 

   दुनिया उम्मीद पर कायम है। बुढापे को भी उम्मीद है कि एक न एक दिन ठाकुर नरेश सिंह को बिस्तर पर गिरा दूंगा। उन्हें नित्य कर्मों में भी तकलीफ दूंगा। दूसरी तरफ ठाकुर साहब भी किसी उम्मीद में ही उस बुढापे से दो चार हाथ कर रहे हैं। हालांकि पता नहीं क्यों वह उम्मीद का दामन थामे हैं। बचपन से लेकर आजतक कितने उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे। कितनों ने उन्हें धोखा दिया। कितनों ने उन्हें लूटा। कितनों ने उनकी शराफत का नाजायज फायदा उठाया। 

   फिर भी जिन्होंने उन्हें धोखा दिया, उनमें से अनेकों उनके संबंधी थे। हालांकि इसी फेहरिस्त में उनके दो जीवित पुत्र  भी शामिल है। पर ठाकुर साहब कभी भी यह सत्य स्वीकार नहीं करते हैं। यही संतान के प्रति उनका मोह है कि मनुष्य देखकर भी अनदेखी करता है। 

   मनुष्य देखकर भी संतान की सभी बातों की अनदेखी कर सकता है। शायद नहीं। जब बात घर से निकलकर समाज तक पहुंच जाये, जब बात बचपन से स्वीकार मत को पार कर जाये, उस समय संतान की भूलें भी माफ करने योग्य नहीं रहती। अनेकों बार संतान द्वारा किया अधर्म इतना बड़ा होता है कि मनुष्य उस संतान का नाम भी नहीं लेना चाहता है। पर क्या वह वास्तव में उस संतान को भूल सकता है। अच्छा हो या बुरा, संतान मन में बैठा ही रहता है। 

    ठाकुर साहब चाहकर भी अपने बड़े बेटे राजीव सिंह को मन से नहीं निकाल पाते। कितना सुशील, संस्कारी लड़का था ।बचपन से ही माता पिता की हर इच्छा को मान देता। उसे कलयुग का श्रवण कुमार भी कह सकते थे। पर श्रवण इस तरह बदल गया। खुद तो दुनिया छोड़ गया पर ठाकुर साहब को बदनामी का दाग दे गया। पूरे समाज में उनकी इज्जत मिट्टी में मिल गयी। 

   हालांकि ठाकुर साहब जब भी उस कारण पर विचार करते जिससे उनकी इज्जत मिट्टी में मिली थी, तब कुछ ऐसा न पाते। क्या राजीव चरित्रहीन था, क्या उसने कोई कानून के विपरीत कार्य किया था। पर उत्तर हमेशा नकारात्मक आता। सच तो यह था कि राजीव भारतीय सेना का रणबांकुरा, भारत माता की हिफाजत करते हुए शहीद हुआ था। 

   सारे इलाके को राजीव की शहादत पर गर्व था। हालांकि उस समय ठाकुर साहब और ठकुरानी की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे। आखिर माता पिता की पीड़ा अपार होती है। 

   अचानक क्या हुआ कि ठाकुर साहब ने अपने आंसू पोंछ दिये। घोषणा कर दी कि मृतक उसका पुत्र नहीं है। पुत्र तो वही होता है जो कि माता पिता का गौरव बने। निश्चित ही वह कोई बहादुर सिपाही है। पर मेरा पुत्र तो नहीं। बिलकुल नहीं। न तो उसकी चिता मेरे हाथों से अग्नि पायेगी और न ही उसके किसी मद पर मैं दावा करूंगा। उनके गम में अब मेरी आंखों से एक भी आंसू नहीं गिरेंगे। 
   
   ऐसे कठोर पिता की आलोचना तो हुई होगी। पर शायद नहीं। ठाकुर समाज ने उन्हें सम्मानित किया। वह ठाकुरों का आदर्श बन गये। उनकी तारीफ में सभायें हुईं। अपनी आन मान के लिये पुत्र का भी परित्याग करने बाले ठाकुर नरेश सिंह समाज के प्रेरणा स्रोत बन गये। 

  ठाकुर साहब के फैसले की सभी ने सराहना की। पर उनके दोनों छोटे बेटे संतोष और प्रेम उनकी बात के आंशिक समर्थन में थे। ठीक है कि ऐसे पुत्र को अग्नि देना गलत है। ठीक है कि ऐसे पुत्र का विधि विधान से तेरई करना भी गलत है। पर उसकी शहादत पर सरकार की तरफ से जो सहायता मिल रही थी, उसे छोड़ना कौन सी समझदारी थी। ऐसे फैसले तो सभी से पूछकर लेने चाहिये। अब बात समाज में फैल चुकी है। हालांकि वह राशि अभी भी सरकारी खाते में अपने उत्तराधिकारी की प्रतीक्षा कर रही है। पर दोनों के पास उस राशि को पाने का कोई तरीका न था। 

  पर ऐसा बिल्कुल नहीं था कि ठाकुर साहब द्वारा मना करने पर भी उस राशि का कोई उत्तराधिकारी नहीं था। कोई और भी था जो कानूनन रूप से उस राशि का उत्तराधिकारी था। अद्भुत बात थी कि दोनों उत्तराधिकारी उस राशि से उदासीन थे। तथा जिनका कोई हक न था, उन्हें आज भी उस राशि की अभिलाषा थी। 

   हालांकि यह सत्य नहीं था कि ठाकुर साहब ने अपने बेटे के दुख में आंसू नहीं बहाये हों। संसार से अलग वह आज भी राजीव के पिता थे। उसकी याद में रो लेते थे। उसकी चिता को अग्नि न दे पाने का भी मलाल करते। 

   ठाकुर साहब बुढापे से मुकाबला कर रहे थे तो मात्र अपनी संगिनी जानकी देवी के कारण। जीवन के हर कदम पर उनका साथ देती आयीं जानकी देवी को अकेले इस संसार में छोड़ना नहीं चाहते थे। आज भी उपयुक्त कसरत करते। पर सत्य यही था कि जानकी देवी उनसे आयु में सात वर्ष छोटी थीं। अभी बुढापे की परिभाषा में ठाकुर साहब से पीछे थीं। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'