प्रेम ही सत्य है एक संसार में,
हमने देखा नहीं बिकते बाजार में।।
प्रेम की है नहीं पाठशाला कोई,
ये महकता है हम सबके व्यवहार में।।
प्रेम में कृष्ण की वो दिवानी हुई,
बन गई कृष्ण की वो सफल साधिका।
रानियों में नहीं नाम आया मगर,
रुक्मिणी से बड़ी हो गई राधिका।।
राधा रूठी तो कान्हा मनाते रहे,
प्रेम धारा बहाते थे मनुहार में।
प्रेम ही सत्य है-------------------।।
प्रेम शबरी ने श्री राम से था किया।
राम ने जूठे बेरों को भी खा लिया।।
जब जनकपुर की महिलाओं ने राम को।
प्रेम से देखा बन कृष्ण अपना लिया।।
ये कहानी नहीं वास्तविकता है ये,
जो झलकती है रामायण के सार में।।
प्रेम ही सत्य है-------------------।।
देखो अमृत हलाहल गरल हो गया,
मीराबाई को सादा तरल हो गया।
कृष्ण का नाम ले वो जहर पी गई,
उसका सारा ही जीवन सरल हो गया।।
प्रेम है साधना एक आराधना,
जो झलकती है प्रेमी के किरदार में।
प्रेम ही सत्य है-------------------।।
दूर रहना है गर जग के संताप से,
नेह हरदम करो अपने मां बाप से।
धरती पर है ये भगवान के रूप दो,
खुद से बढ़ कर करें प्रेम जो आपसे।।
इनको रावत कभी भी भुलाना नहीं,
साथ देते यही जीत में, हार में।
प्रेम ही सत्य है-------------------।।
रचनाकार
भरत सिंह रावत भोपाल

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