कभी राधा रोती है, तो कभी मीरा रोती है
कान्हा की याद में पलकें, दोनों रोज भिगोती हैं
मैं कैसे कह दूँ यह उनका, समर्पण है सब झूठा
कभी प्रेम है बरसा, कभी भक्ति बरसाती है


दोनों ने ही पूजा है, श्याम को जी भर के
दोनों ने पिये विष प्याले, अमृत समझ कर के
दोनों के पांव में ही बेड़ियां, डालने को सब तैयार
दोनों ने ही तोड़े हैं, बंधन सभी दुनिया भर के


राधा ने तो कान्हा को, बसाया था साँसों में
मीरा ने मन मंदिर मे, सजाया था आंखों में
एक मूर्त को अपना, अब भगवान समझ लेना
प्रेम भी पाप था देखो, लोगों की बातों में


मीरा ने सौंपा था जीवन, करने को बस दर्शन
राधा का प्रेम पावन, जैसे जमना का जल निर्मल
ना मारो इसमें कंकड़ तुम, अब ए दुनिया वालों
जो आया भंवर कहीं, तो संभलना होगा मुश्किल


करो मत अब तुलना तुम, दोनों के नाम की
दोनों ने जिया खुद को, दासी बनकर श्याम की
हर कोई प्यारा कान्हा को, जिसने भी उसे चाहा
मीरा और राधा तो, पावन प्रेम का प्रमाण थी


🖋️ रवि गोयल