जहरीला पानी कहें
शराब कहें
कड़वी चाय कहें
या फिर 
कुछ और
क्या पता कितने 
नाम है इसके ।
सबने अपने -अपने
हिसाब से
इसका नामकरण
कर रखा हैं ।
पर क्या
फर्क पड़ता है इससे
काम तो एक ही है इसका.....

जिंदगी का खात्मा ।
पीने वालों की भी
और उसके आसपास
रहने वाले लोगों की भी  ।

कहने को हर रोज
इस पर बैन लगता है
पर
फिर भी
मिलता हर जगह हैं ।

और पीने वालों का तर्क-
हमने ही तो देश को 
चला रखा है ।
आखिर हमारे पीने से ही
तो अर्थव्यवस्था
व्यवस्थित रहती है ।

सरकार और पीने वाले
दोनों को ही 
आखिर क्यूं नहीं 
समझ आती ये बात .....
क्या फायदा ऐसी
आमदनी,
अर्थव्यवस्था का
जो किसी के घर की
नींव पर खड़ी हो ।

जो बचपन और इंसानियत
के टुक्ड़े कर दे.......

यहीं है 
जहरीला पानी ।
मुकेश दुहन" मुकू"
सोनीपत हरियाणा