अनेकों बार जीवन का कुछ काल पूरे जीवन पर भारी पड़ जाता है। अनेकों बार पूरे जीवन की धारणा कुछ ही महीनों में चकनाचूर हो जाती है। फिर मनुष्य के मन में किसी के लिये भी विश्वास नहीं रहता। वह तटस्थ होने लगता है। रिश्ते और नातों से दूरियां बनाने लगता है।
संध्या ने जीवन में बहुत संघर्ष किया। उसका जीवन किसी भी महिला को प्रेरित कर सकता था। दूसरी स्त्रियों को विपत्ति से न डरने का पाठ पढाती आयी वह संध्या कुछ महीनों से उदासीन थी। मन ही मन अपनी पूर्व धारणा की आलोचना करती। उसे लगता कि जैसे उसकी पूर्व धारणा गलत है। स्त्री को सहारे की आवश्यकता होती है। और वह खुद निःसहाय है। पता नहीं क्यों उसने इतना बड़ा निर्णय ले लिया। क्यों वह राजीव के जीवन में पहुंच गयी। दोनों ही तरफ से उसे कोई सम्मान नहीं मिला। न वह ब्याहता रही और न अविवाहित। उस पर जब राजीव शहीद हुआ, तब राजीव का अंश उसके गर्भ में पल रहा था। एक गर्भवती स्त्री से भी समाज की ऐसी बेरुखी। माना कि वह छोटी जाति से है। पर उसका गर्भ तो राजीव का ही अंश है।
ऐसे अनेकों पलों में जबकि वास्तव में एक स्त्री को सहारे की आवश्यकता होती है, संध्या ने किसी का सहारा नहीं लिया। पुत्र जन्म के अवसर पर भी माॅ और भाभी से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। हालांकि संध्या इसका कारण अंतर्जातीय विवाह को ही मानतीं आयी थी। इस अंतर्जातीय विवाह के कारण ही तो दोनों परिवारों ने अपने बच्चों से दूरी बना ली। पर यथार्थ उससे अधिक भयानक था। यथार्थ के सही प्रगट होने का समय आ चुका था। और जब यथार्थ सामने था, संध्या वास्तव में संसार से तटस्थ हो गयी।
आज संध्या उन दिनों को याद कर रही थी जबकि उसने अपने जीवन में आगे बढने का फैसला लिया था। जबकि उसके मन में राजीव के लिये पवित्र प्रेम का पदार्पण हुआ था। जबकि वह और राजीव दोनों एक दूसरे के नजदीक पहुंचे थे।
सात साल पहले की बात। जब संध्या की तैनाती दुर्गम पहाड़ी इलाकों में कर दी गयी। ऐसी जगह जहाँ कोई भी स्त्री जाना नहीं चाहती। जहाँ पग पग पर जान का खतरा होता है। जहाँ हर रोज मृत्यु देवी गुजरती है। जहाँ की हर सुबह शाम का दर्शन कर पाने की दुआ के साथ शुरू होती है। तथा दिन का अंत भी सुबह के दर्शन की प्रार्थना से होता है।
दूर दूर तक केवल बर्फ ही बर्फ थी। मौसम बहुत ठंडा और हर रोज दूसरे देश की सीमा से गोलाबारी की घटनाएं। हालांकि सेना भी थोड़ा महिला फैक्टर रहता है। वैसे ऐसे इलाकों से महिला फौजियों को दूर ही रखा जाता है। पर बिलकुल शून्य नहीं। हालांकि जिन महिला फौजियों की ड्यूटी इन इलाकों में लगायी जाती, उनका काम निश्चित ही आसान इलाकों से ज्यादा कठिन हो जाता।
हर काल में देशभक्तों के साथ धोखेबाज पाये जाते रहे हैं। जहाँ पहाड़ी इलाकों के अनेकों बाशिंदे देशभक्ति की अलख जगा रहे थे, वहीं कुछ धोखेबाज पैसों की खातिर अपना ईमान और भारत माता की इज्जत भी बेचने में पीछे नहीं रहते। अक्सर दूसरे देशों से आये घुसपैठिए इन्हीं स्थानीय कुछ लोगों के घर में शरण लेते। फिर अनेकों बार ऐसे गद्दारों की धरपकड़ आवश्यक होती। किसी भी परिवार में जांच करने के लिये महिला सहयोगियों की जरूरत भी होती है। ऐसे ही अन्य कारणों से महिला फौजियों की भी तैनाती हो रही है। इसे सौभाग्य मानें या दुर्भाग्य कि संध्या की तैनाती भी ऐसे दुर्गम क्षेत्र में हो गयी।
वास्तव में यह दुर्भाग्य ही अधिक लगता है। दुर्गम इलाके में मात्र कुछ महिला साथियों के साथ ड्यूटी करना कभी भी आसान नहीं होता है। महिला साथियों के रूप में मात्र चार महिलाएं ही तैनात थीं।
ऐसे ही समय में संध्या की मुलाकात कैप्टन राजीव से हुई। जहाँ अधिकांश पुरुषों की आंखों में कहीं न कहीं कामुकता नजर आती, वहीं राजीव की आंखों में महिलाओं के प्रति सम्मान। यही बात राजीव को अन्य से अलग करती। यही गुण संध्या को राजीव के नजदीक ले आया।
राजीव जो खुद अविवाहित युवक था। हालांकि उसके दोनों छोटे भाइयों का विवाह हो चुका था। लगता था कि वह आजीवन अविवाहित रहने का निश्चय कर चुका है। पर वास्तव में वह अपने योग्य जीवनसंगिनी की तलाश में था। जितने भी रिश्ते उसके लिये आये, उसमें उसे वह बात नजर ही नहीं आयी जो कि वह अपनी संगिनी में चाहता था। माता पिता का परम भक्त राजीव की संगिनी उसी की तरह उसके माता पिता का सम्मान करने बाली होनी चाहिये। राजीव को इस विषय में किसी भी लड़की पर विश्वास नहीं हुआ। धीरे-धीरे उसके लिये रिश्ते भी आने बंद हो गये। उसके छोटे भाइयों के लिये रिश्ते आने लगे। उन रिश्तों के विषय में भी राजीव तटस्थ रहा था। हालांकि उसे विश्वास था कि दोनों की पत्नियां इस जिम्मेदारी से दूर भागेंगी। निःसंदेह इस विषय में राजीव की राय सही थी। लगता है वह दूसरों के मन में छिपे भावों को सही तरह पढ लेता था।
साथ साथ काम करते हुए राजीव और संध्या दोनों एक दूसरे पर विश्वास करने लगे। विश्वास ही प्रेम का आरंभ और परिणति है। विश्वास की बुनियाद पर ही रिश्ते की मजबूत इमारत खड़ी होती है। विश्वास ही जीवन का ध्येय है। विश्वास ही वह गठबंधन है जो कि पति और पत्नी को एक दूसरे से जोड़ता है।
राजीव और संध्या दोनों उसी विश्वास के बंधन में बंध चुके थे। दोनों को ही दोनों के जीवन के सारे रहस्य पता थे। दोनों के मन में प्रेम की बांसुरी बजने लगी। पर दोनों ही एक दूसरे से आरंभ की प्रतीक्षा करते रहे।
प्रतीक्षा कभी न कभी तो पूरी होनी ही थी। कभी न कभी तो दोनों को अपने मुख से वह सत्य स्वीकार करना था जो कि संसार से तथा एक दूसरे से भी छिपाते आये थे। कोई तो ऐसा क्षण आता ही है जबकि दिल की बात जबान पर आ जाती है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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