मैं हूं तुम्हारी धरती।
ना जीती ना ही मरती।
आखिर इतना बोझ है मुझपर।
इतना जुल्म ना ढ़ाओ मुझपर।
बढ़ती आबादी को रोको।
इंसानों अब खुद को टोको।
मेरा जल हो गया अशुद्ध।
मेरा वायु हो गया अशुद्ध।
कहां से लाऊं अतिरिक्त भूमि।
देखो तो मेरे आंखों की नमी।
रखो अब संतुलित आबादी।
रोक लो इंसानों महाबर्बादी।

                    -चेतना सिंह।