जब मनुष्य आयु के उस मोड़ पर पहुंच जाता है कि उसे लगने लगता है कि कभी भी उसका ईश्वर के घर से बुलाबा आ सकता है, उस समय वह बचपन से लेकर बुढापे तक की विभिन्न बातों की चिंता करने लगता है। विभिन्न क्रिया कलापों में खुद की भूमिका तलाशने लगता है। जो भूल वह सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करता, मन ही मन उन्हीं भूलों का स्मरण करता है।

   ठाकुर नरेश सिंह और उनके छोटे भाई ठाकुर सुजान सिंह की आयु के मध्य बहुत अंतर था। वैसे दोनों के मध्य एक बहन सुजाता भी थी। जब सुजान सिंह का जन्म हुआ, उस समय नरेश सिंह पूरे बारह बर्ष के थे। गांव की पाठशाला की पढाई पूरी कर नजदीकी गांव में जूनियर हाईस्कूल पढने जाते थे। वैसे उन दिनों भाइयों की आयु में इससे भी अधिक अंतर रहा करता था। कई बार तो दो भाइयों की आयु में इतना अंतर भी हो जाता कि बड़ा भाई एकदम पिता लगने लगता।

  कुछ समय के संस्कार थे कि सुजान सिंह ने हमेशा अपने बड़े भाई को पिता जैसा आदर दिया। नरेश भी सुजान से बड़ा प्रेम करता था।

  जब जानकी देवी विवाह कर घर आयीं तब सुजान ने भी उन्हें केवल भाभी कहने के बजाय भाभी माॅ कहा। जानकी ने भी सुजान को अपना पुत्र ही माना। तीन बेटों के होने के बाद भी सुजान ही ठाकुर नरेश सिंह और जानकी देवी का बड़ा पुत्र रहा। सुजान सिंह को पूरा अधिकार था कि वह नरेश सिंह के बेटों को फटकार दे। इसी तरह सुजान सिंह के दोनों बेटों को ठाकुर नरेश सिंह अधिकार के साथ कुछ भी कह सकते थे। दो भाइयों में दो जैसा कुछ भी नहीं रहा। एक के मुंह से निकली बात दूसरे की आन का प्रश्न बन जाती।

  फिर क्या हुआ कि बुढापे की अवस्था में दोनों भाई अब एक दूसरे से बोलते भी नहीं है। दोनों का एक दूसरे के घरों में आना जाना वर्षों से बंद है। हालांकि लगता है कि दोनों ही भाई इस नफरत की दीवार को तोड़ देना चाहते हैं। पर शायद चाहकर भी ऐसा कर नहीं पा रहे।

   आज भी नरेश सिंह का मन होता है कि वह अपने छोटे भाई से उसी तरह गले लग जाये जैसे कि पहले लगता रहा है। आज भी दोनों भाइयों में दो जैसा कुछ न रहे। पर कर नहीं सकते थे। दो शरीर और एक प्राण दो भाइयों में प्रथकता का आरंभ भी तो ठाकुर नरेश सिंह ने ही किया था। एक तरफ उनके भाई का पुत्र और दूसरी तरफ उनका पुत्र प्रेम था, उस समय यह जानते हुए भी कि प्रेम ही गलती पर है, उन्होंने प्रेम का ही साथ दिया था। निश्चित ही उस विषय में कुछ किया भी नहीं जा सकता था। बात बहुत आगे थी। जो होना था, वह हो चुका था। घटना को बदला नहीं जा सकता था। फिर भी लगता है कि कुछ हो सकता था। हो सकता था कि ठाकुर नरेश सिंह अपने छोटे बेटे के अनुचित कृत्य का समर्थन न करते। हो सकता था कि उस समय भी वह अपने छोटे भाई की आवाज को अपना स्वर बनाते। पर ऐसा नहीं हुआ। बात आन की आ चुकी थी। खुद के पुत्र को सही सिद्ध करना आवश्यक था। चाहे इसके लिये छोटे भाई का और उसके परिवार का कितना भी अपमान करना पड़े। 

   सुजान सिंह कभी भी अपने बड़े भाई से नाराज नहीं हुए। हमेशा उनका सम्मान करते थे। पर जब ठाकुर नरेश सिंह की तरफ से वास्तव में अति हो गयी, उस समय उनका भी धैर्य जबाब दे गया। हालांकि जिस अप्रत्याशित घटना के कारण दो भाई अलग हुए थे, उस घटना को बदल पाने में दोनों ही असमर्थ थे। फिर भी भाइयों के मध्य प्रेम रह सकता था। जो नहीं रहा। वह भी आयु की इस अवस्था में। 

  अब ठाकुर नरेश सिंह ईश्वर को दोष नहीं देते हैं। बल्कि अपनी स्थिति का कारण खुद को ही मानते हैं। जीवन में ऐसा पल आया कि बड़ा पुत्र शहीद हो गया। ठाकुरो की आन निभाने के लिये अपने पुत्र को खुद अग्नि भी नहीं दी। दोनों छोटे बेटों द्वारा उनकी लगातार उपेक्षा की जा रही है। इन सबका दोषी क्या ईश्वर हैं। निश्चित ही नहीं। कुछ तो उनके ही कर्म अपना प्रभाव दिखा रहे हैं। 

लगता है कि आज भी ठाकुर नरेश सिंह को अपने बेटों के सहारे की जरूरत नहीं है। लगता है कि आज भी उनका छोटा भाई, चुपचाप पुत्र का कर्तव्य निभा रहा है। अन्यथा इतना विवाद होने पर भी छोटे भाई ने अपनी नातिन का घर आना जाना बंद क्यों नहीं कराया। कहने को तो लाख बहाने हैं। कह सकते हैं कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं। वह अपना पराया नहीं जानते। कह सकते हैं कि ठाकुर नरेश और जानकी देवी से बेटी को प्रेम मिला, इसलिये वह बड़े दादा और बड़ी दादी की लड़ेती बन गयी। पर बचपन की भी एक अवस्था होती है। कभी न कभी तो बालक के सच जान ही लेता है। कभी न कभी वह बाल सुलभ सहजता को त्याग दुनिया के रंग में रंगने लगता है। 

   अब जबकि छोटे भाई की नातिन लक्ष्मी कक्षा आठ की छात्रा है, वह नजदीकी कस्बे में साइकिल से पढने जाती है, अच्छा और बुरा समझने की स्थिति में है, आज भी लक्ष्मी अपने बड़े दादा और दादी का ध्यान रखती है। उनकी जरूरत की वस्तुओं को नजदीकी कस्बे से वही लेकर आती है।घर के काम में भी वही जानकी देवी की सहायता करती है। दुख के विभिन्न पलों को ठाकुर साहब सहन कर पा रहे हैं तो मात्र अपनी नातिन के निस्वार्थ प्रेम के कारण। लगता है कि दोनों भाइयों के मध्य जो अहम की दीवार है, वह कभी भी दादा और नातिन के मध्य स्नेह की बारिश से भडभड़ा कर गिर सकती है। लगता है कि एक बार फिर से दोनों भाई एक हो सकते हैं। लगता है शायद दोनों भाई एक बार फिर से एक दूसरे के आंसुओं को पोंछ सकते हैं। लगता है कि शायद दोनों भाई एक बार फिर से सही और गलत की सही विवेचना कर सकते हैं। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'