सुबह की धूप मखमली सी है "
तेरी यादों की कमी सी है! 
टूटते शाख के पत्ते से तुम "
लौट आओ, आंखों में नमी सी है!! 

इंतज़ार के दिन गुजरे, महिनो में "
धडकने मध्यम सी है, सीने में! 
कुछ बचा है, ही नही, तुमबिन यहाँ "
सांसे अब तो अनकही सी है!! 

शब्द अब मौन से है, मेरे "
 सब पूछते हैं, कौन हैं तेरे! 
सवाल खुद जबाब बन ही गये, 
ये बात और है, जिंदगी नयी सी है!! 

प्रेम सच्चा है,  हर बार तोडते क्यूँ हो"
मूर्ति को पाषाण समझते क्यूँ हो! 
बंदिशे की बड़ी दीवार, पता था तुमको"
तुम बिन कैसे जियें,आंखे भरी सी है!! 

कर लिया सौदा "क्यूँ जमाने से"
अब तो डर लगता है, फसांने से! 
अपने ही, बन जाते है, क्यूँ अजनबी "
किसे बताऊँ, तुम जिदंगी, खत्म सी है!! 
 श्रीमती रीमा महेंद्र ठाकुर "वरिष्ठ लेखक"
राणापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत