गुजारिश है नीली छतरी वाले से।
जिसने जगत उतारा जाने किस आले से।

इंसान बनाया पर कमी की इंसानियत में।
फर्क नहीं दिखता इंसानियत और हैवानियत में।

क्यों ना बनाता अब राम-लखन से भाई।
क्यों ना है अब सुमित्रा सी सौतेली माई।

जिसे देखो वह लोभ,मद में डूबा।
बताते है कि यह धर्म का मनसूबा।

देखते-देखते आ गए कितने धर्म।
पर शायद ही कोई करता सत्कर्म।

छतरी की छांव में बेईमानी की धूप से बचा।
छतरी की छांव में मक्कारी की बरसात से बचा।

गुजारिश है नीली छतरी वाले से।
विशालकाय छतरी ओढ़े किसी निराले से।
         -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण।