जीवन  कई  उपकारों  से ऋणित 
जीवन कई हाथों से सृजित 
कई बसंत बन गये पतझड़ 
फिर भी जीवन की बगिया हरित 

कभी कर्तव्य तो कभी सीधा उपकार पाया 
किसी का साथ तो किसी का ख्यालात पाया 
बुलबुले कब फैल गये ताड़ाग में 
सुबह को शशांक ,शाम में दिनकर को तनहा पाया 

माँ बाप का उपकार तो अनमोल है 
गुरु बंधु के आगे तो शब्द मौन हैं 
विज्ञान ने भी क्या क्या श्रजन किया 
लेकिन बताओ इंसान अब यहां कौन है 

सूरज पिघल पिघल कर ऊर्जा लुटाये 
मोड़कर कुछ मार्ग चंद रात्रि महकाये 
सारी प्रकृति यहां तो उपकार में लगी 
लेकिन इंसानियत सारी ऊर्जा
 इंसानियत खोने में लगाये 

आत्मा जिस्म को जिलाये है रखी 
बूंद वारि की तृष्णा मिटाये है रखी 
आग खुद को भस्म कर क्या क्या करे 
पवन न हो तो दुनिया क्या बने 
H2O का यहां लम्बा सफर 
गर जमी न हो तो सब कैसे थमें 

उपकार ही तो है  कुछ करते भलाई 
कुछ की खातिर कुछ यहां करते लड़ाई 

लेकिन यहां कुछ लोग ओढें चादर नकली 
करें एक उपकार लेकिन बजायें सारा जीवन ढ़पली 
कुछ तो उपकारित का उपहास उड़ाते 
यह देख उपकार थोड़ा मंद हस ली 
आलोक सिंह "गुमशुदा"
अभियांत्रिक सहायक 
आकाशवाणी रायबरेली