अलसाई सी इक सुबह में..
खो गयीं थी मैं नींद के आगोश में..
तन मेरा था सोया..
मन रहा था जाग..
भीतर मचा था एक द्वन्द...
रंगों का एक इंद्रधनुष सा....
कर रहा था मन को मेरे प्रफुल्लित...
जागे जब अरमान तो...
पिघला मन का मायाजाल..
स्पष्ट हुआ नज़रों का दर्पण..
दिखे बिखरे हुए रंग हज़ार..
निखर  गया जब सुबह का  प्रकाश...
आंतरिक मन ने पूछा मेरे बाहरी मन से...
कौन हो तुम??? जो फैला रही हो रंगों का समुन्दर?..
क़्या छुपा हैं आखिर तुम्हारे अंदर?...
जो मन को कर रहा इतना प्रफुल्लित??..
क़्या तुम खुद भी हो इतनी ही आनंदित??..
तितली हो तुम तो...
अवश्य ही होंगी अपने रंगों में खोयी??...
होकर उदास बोली तितली....
मैं कोई और नहीं...
तुम ही तो मैं हूँ...
रंग मेरे ये.. मुझसे भी रहे अछूते...
साल दर साल बीत गए...रंगों में उलझे...

सच ही तो था ये सपना...
रंग मेरा ना था खुद अपना...

हक़ इस पर तो जताया सभी ने...
जो थी पहचान तितली की...