कुछ लोग करके दूजों की निंदा।
मानों इसी आधार पर रहते जिंदा।

कहते हैं निंदा नहीं करनी चाहिए।
कुछ कहते निंदा भी सुननी चाहिए।

लेकिन आखिर कब तक सुने निंदा।
धैर्य टूट सकता है सुनकर निंदा।

मानाकि सहनशक्ति होनी चाहिए।
पर निंदकों पर भी लगाम चाहिए।

निंदा की जगह हो प्रेम और सहयोग।
करके देखो तो जीवन में प्रयोग।

निंदा सुनकर हम ला सकते निखार।
पर कब तक निंदकों के चरण ले पखार।

ज्यादा चुप्पी से निंदक जाते सर पे चढ़।
निंंदक अक्सर अपने दोष देते दूजों पे मढ़।

परे हटाओ कटु निंदा को।
चोट ना पहुंचाओं किसी परिंदा को।






         -चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण।