जिस तरह मैंने लिया है जन्म, वह भी लेता है जन्म, हे जमीं।
वह मिट सकता है मगर, आत्मा उसकी कभी मिट नहीं सकती।।
बना लेता है वह भी आशियाँ, मेरी तरहां , हे जमीं।
आशियाँ उसका उजड़ सकता है, बस्ती उसकी उजड़ नहीं सकती।।


कहीं न कहीं आबाद,जिंदाबाद वह मिल ही जाता है ,हे जमीं।
हो भी जाये बर्बाद वह मगर, आबादी उसकी मिट नहीं सकती ।।
जवां है मेरी ही तरहां वह भी, अपनी इस जवानी में, हे जमीं।
जवानी उसकी मिट सकती है, कहानी उसकी मिट नहीं सकती।।


केवल एक प्रदेश में ही नहीं, यह फ़िजा महकी है दिल्ली तक, हे जमीं।
हस्ती उसकी इस धरती पर, विश्व में कभी गुम हो नहीं सकती।।
जिसको बयां कर रहा है हर कोई वजीर, कवि अपनी सभा में ,हे जमीं।
अड़िग है वह भी मेरी तरहां ही , रफ्तार उसकी बदल नहीं सकती।।


अपनी मंजिल पे पहुंचने को बेताब, वह लड़ रहा है तूफानों से , हे जमीं।
उसके पैर काट सकते हो तुम, चादर उसकी छोटी हो नहीं सकती।।
जिंदा है वह भी मेरी ही तरहां, ख्वाब अपनी आँखों में संजोये, हे जमीं।
झुक सकती है उसकी आंखें मगर, इच्छा उसकी मिट नहीं सकती।।


मैं मर जाऊंगा, मेरी अगली पीढ़ी भी मर जायेगी हिन्दुस्तां में, हे जमीं।
हॉं , गरीब मिट सकता है जमीं पर मगर , गरीबी कभी मिट नहीं सकती।।




रचनाकार एवं लेखक- 
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद