बुझी बुझी सी उदास उदास
मौन मौन मन बड़ा अशांत हैं
जिससे मन की बातें कह सकूं
ऐसी एक सखी की तलाश है
दिल के रंजो गम बांट सकूं
जिसके कंधे पर सर रख
कर मन भर रो सकूं 
ऐसी एक सखी की तलाश है
उतार फेंकू मन के सारे बोझ को
अपनी बातों से मन मेरा बहला दे 
रोते हुए मेरे आसुओं को 
पोंछ कर ढाढस बंधाये 
ऐसी एक सखी की तलाश है
भूल जाऊं जिसके सानिध्य में
आकर अपने सारे दुःख दर्द
जी भर कर हंस लूं खिलखिला 
  मिटा दे मेरे सारे कष्ट 
ऐसी एक सखी की तलाश है
नेहा धामा " विजेता " 
बागपत , उत्तर प्रदेश